डिजिटल दौर में प्यार और जीरो ट्रस्ट की चुनौती

डिजिटल दौर में प्यार और जीरो ट्रस्ट की चुनौती
नई दिल्ली /13 सितंबर 2026 /जनता आवाज न्यूज रिसोर्स
स्मार्टफोन आज इंसानी जिंदगी का सबसे अहम और अटूट हिस्सा बन चुका है। अगर मानव इतिहास पर नजर डालें, तो आग की खोज और पहिये के आविष्कार के बाद अगर किसी एक तकनीक ने इंसानी समाज और उसके सोचने के तरीके को सबसे ज्यादा बदला है, तो वह यही हमारी हथेली में समा जाने वाला छोटा सा डिजिटल डिवाइस ही है। यह उपकरण एक तरफ आपात स्थिति में एम्बुलेंस बुलाने, रास्तों का नक्शा दिखाने, दुनिया भर की भाषाओं का पल भर में अनुवाद करने और परिवार के अनमोल लम्हों को डिजिटल तस्वीरों में सहेजने का काम करता है।
लेकिन इस सिक्के का दूसरा पहलू बेहद जटिल और डरावना है। यही फोन आज एक ऐसा गुप्त जरिया भी बन चुका है, जहां से इंसान अपनी वास्तविक और सामाजिक जिंदगी के ठीक समानांतर एक दूसरी गुप्त दुनिया बहुत आसानी से बना लेता है। यह एक ऐसी दुनिया है जिसका दरवाजा सिर्फ उसी के पास होता है और वहां किसी दूसरे का प्रवेश लगभग असंभव बना दिया जाता है।
हमारे स्मार्टफोन पूरी तरह से व्यक्तिगत और सुरक्षा परतों से ढके होते हैं। इनमें चार अंकों के पिन, जटिल पासवर्ड, स्क्रीन पैटर्न lock, फिंगरप्रिंट और फेस बायोमेट्रिक जैसी सुरक्षा प्रणालियों का पहरा होता है। यह फोन सुबह उठने से लेकर रात को सोने तक, हमारे बेडरूम, दफ्तर, सफर, रेस्टोरेंट और हर उस निजी जगह साथ रहता है, जहां की गतिविधियां हम दुनिया से छुपाना चाहते हैं।
इस कदर बढ़ी हुई व्यक्तिगत गोपनीयता और सेकंडों में संवाद करने की सहूलियत ने इंसानों के लिए दोहरी जिंदगी जीना बहुत आसान बना दिया है। पहले के समय में किसी से छुपकर बात करने या रिश्ता रखने के लिए कई इंतजाम करने पड़ते थे, लेकिन आज यह सब सिर्फ एक स्क्रीन स्वाइप का खेल बनकर रह गया है।
तकनीक की इस बेतहाशा रफ्तार को देखकर पुरानी पीढ़ी के लोग अक्सर सोचते हैं कि वे इन सब चीजों से दूर और पूरी तरह सुरक्षित हैं। उनका मानना होता है कि वे फोन का इस्तेमाल केवल जरूरी काम, समाचार पढ़ने, डिजिटल बैंकिंग या रिश्तेदारों से सामान्य बातचीत के लिए करते हैं। लेकिन हकीकत यह है कि डिजिटल तकनीक का बुनियादी ढांचा ही कुछ इस तरह डिजाइन किया गया है जो इंसान को अपनी गतिविधियों को गुप्त रखने का अवसर देता है।
यही गोपनीयता बैंकिंग, व्यापार और व्यक्तिगत डेटा सुरक्षा के लिए तो वरदान साबित होती है, लेकिन जब बात रिश्तों, शादीशुदा जिंदगी और दो इंसानों के बीच के आपसी भरोसे की आती है, तो यह तकनीक एक बेहद पेचीदा और विनाशकारी मोड़ पर लाकर खड़ा कर देती है।
जब भी किसी रिश्ते में स्क्रीन के पीछे छुपाए जा रहे राज का पर्दाफाश होता है, तो सबसे पहले सफाई देने और बात को संभालने की कोशिशें शुरू होती हैं। अक्सर कहा जाता है कि जो देखा गया है वैसा कुछ नहीं है, या बात को किसी दूसरे नजरिए से समझने की जरूरत है। लेकिन इन सफाई देने की कोशिशों के सामने जब जीवनसाथी की तरफ से सन्नाटा मिलता है, तो वह सन्नाटा शब्दशः दिल तोड़ देने वाला होता है।
यह सन्नाटा केवल गुस्से, चीख-पुकार या बहस का नहीं होता। यह एक ऐसा सन्नाटा होता है जिसे तकनीकी और मनोवैज्ञानिक भाषा में 'जीरो ट्रस्ट' कहा जाता है। इसका सीधा मतलब होता है कि रिश्ते में भरोसे की पुरानी इमारत पूरी तरह से ढह चुकी है।
जीरो ट्रस्ट की स्थिति में पहुंचने का मतलब यह है कि इंसान उस पल में खड़ा होता है जहां से रिश्ते का बुनियादी आधार खत्म हो चुका होता है। डिजिटल धोखे या किसी गुप्त गतिविधि के पकड़े जाने के बाद सबसे बड़ी समस्या प्यार की कमी नहीं होती, क्योंकि दिल के किसी कोने में प्यार फिर भी बचा रह सकता है।
असल सवाल और सबसे बड़ा संकट यह पैदा होता है कि अब सामने वाले इंसान की किस बात पर यकीन किया जाए और किस बात को झूठ समझा जाए। जब सच्चाई को नापने का कोई भी पैमाना या जरिया नहीं बचता, तो रिश्ता धीरे-धीरे दम तोड़ने लगता है।
साइबर सुरक्षा और कंप्यूटर नेटवर्क की दुनिया में 'जीरो ट्रस्ट' एक बेहद प्रसिद्ध और वैज्ञानिक सिद्धांत है। इस सुरक्षा मॉडल का सीधा सा नियम होता है कि "कभी भी किसी पर आंख बंद करके भरोसा मत करो और हमेशा हर गतिविधि का सत्यापन करो।"
कंप्यूटर और सर्वर की सुरक्षा के लिए बनाया गया यही कठोर नियम आज अनजाने में हमारे घरों, बेडरूम और इंसानी रिश्तों में दाखिल हो चुका है। हर समय फोन को उल्टा करके रखना, पासवर्ड बार-बार बदलना, चैट हिस्ट्री मिटाना और लोकेशन सेवाएं बंद करने की आदत ने इंसानी रिश्तों से स्वाभाविक सहजता और निश्चिंतता को पूरी तरह खत्म कर दिया है।
प्रसिद्ध विचारक और लेखक रिचर्ड क्रूगर अपने विचारप्रवर्तक लेख "Love in the Age of Zero Trust" में इसी आधुनिक मानवीय और डिजिटल त्रासदी पर बहुत गहराई से रोशनी डालते हैं। वे अपनी चार दशकों की शादीशुदा जिंदगी और डिजिटल युग के अनुभवों का हवाला देते हुए एक बेहद गंभीर सवाल पूछते हैं।
वे पूछते हैं कि क्या जिस आधुनिक तकनीक ने इंसानी रिश्तों में भरोसे को तोड़ा है, क्या वही तकनीक फिर से उसी भरोसे को स्थापित करने का जरिया बन सकती है? क्या हमें बीते दिनों की सादगी भरी यादों में लौटने की व्यर्थ कोशिश करने के बजाय तकनीक के ही पारदर्शी साधनों का सहारा लेकर आगे बढ़ना होगा?
अंतरराष्ट्रीय स्तर पर हुए विभिन्न मनोवैज्ञानिक और सामाजिक शोध इस डिजिटल संकट की भयावह तस्वीर पेश करते हैं। अमेरिकन साइकोलॉजिकल एसोसिएशन और विभिन्न वैवाहिक अध्ययन संस्थानों की रिपोर्ट बताती है कि आधुनिक समय में लगभग 60 से 70 प्रतिशत जोड़े किसी न किसी रूप में 'डिजिटल इंफिडेलिटी' यानी इंटरनेट और स्मार्टफोन के जरिए होने वाली अविश्वास की समस्या से जूझ रहे हैं।
ब्रिटेन और अमरीका में हुए डिजिटल बिहेवियर सर्वे के आंकड़े बताते हैं कि 18 प्रतिशत से अधिक लोग अपने पार्टनर को फोन के जरिए डिजिटल अफेयर में पकड़ चुके हैं, जिनमें से लगभग 59 प्रतिशत रिश्ते तुरंत टूट गए। इसके अलावा, 10 में से 1 रिश्ता केवल फोन की संदिग्ध गतिविधियों को लेकर होने वाले झगड़ों के कारण खत्म हो जाता है।
शोध से यह सच भी सामने आया है कि आधुनिक दौर में 66 प्रतिशत लोग ऑनलाइन धोखे या डिजिटल अविश्वास को शारीरिक धोखे के बराबर ही दर्दनाक मानते हैं। मोबाइल फोन को हर समय अपने साथ चिपका कर रखना, फोन का पासवर्ड न बताना, दो फोन रखना या पार्टनर के आते ही स्क्रीन बंद कर देना - ये वे लक्षण हैं जिन्हें आज समाज में 'रेड फ्लैग' या खतरे की घंटी माना जाने लगा है।
यह डेटा इस बात का साफ सबूत है कि स्मार्टफोन ने इंसानी दिमाग और रिश्तों की संरचना को किस कदर तनावग्रस्त कर दिया है। आज युवा पीढ़ी में अपने पार्टनर का फोन चेक करने की बीमारी बुजुर्गों के मुकाबले दोगुनी से ज्यादा पाई जाती है। 18 से 24 साल के लगभग 59 प्रतिशत युवा फोन चेक करने या पार्टनर की ऑनलाइन गतिविधियों पर नजर रखने की आदत से पीड़ित हैं।
आज डिजिटल दुनिया में कदम-कदम पर एल्गोरिदम इंसान को लगातार भटकाने और भ्रमित करने में लगे हैं। बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां बिना हमारी पूरी समझ के शर्तें मनवाती हैं, विज्ञापन हमारे व्यवहार और पसंद-नापसंद को नियंत्रित करते हैं और हमारे हर क्लिक पर नजर रखी जाती है।
इस माहौल के बीच जब हर इंसान की जेब में एक एन्क्रिप्टेड, बायोमेट्रिक और हमेशा इंटरनेट से जुड़ा रहने वाला उपकरण मौजूद है, तो निष्ठा, वफादारी और पारदर्शिता की उम्मीद रखना अपने आप में एक कठिन मानवीय परीक्षा बन गया है।
रिश्तों में दोबारा भरोसा कायम करने के लिए अब केवल पुरानी मीठी बातें, वादे या भावनात्मक दुहाइयां काफी नहीं होतीं। जब तक डिजिटल साक्ष्यों और व्यावहारिक व्यवहार में पूरी पारदर्शिता नहीं आती, तब तक ढहा हुआ पुराना विश्वास आसानी से वापस नहीं लौटता।
लेखक रिचर्ड क्रूगर का मानना है कि इस आधुनिक युग में तकनीक को सिर्फ बातें छिपाने या राज रखने का जरिया बनाने के बजाय, इसे अपनी सच्चाई, निष्ठा और जवाबदेही सिद्ध करने का माध्यम बनाया जाना चाहिए। अगर तकनीक ने जीरो ट्रस्ट का माहौल बनाया है, तो तकनीक के ही पारदर्शी इस्तेमाल से 'वेरिफाइड ट्रस्ट' यानी प्रमाणित भरोसा भी बनाया जा सकता है।
डिजिटल युग में अविश्वास और धोखे से बचने का सबसे आसान तरीका यह है कि जोड़े अपने फोन और सोशल मीडिया के इस्तेमाल को लेकर कुछ स्पष्ट और सख्त नियम तय करें। जैसे- घर के भोजन के मेज पर फोन का इस्तेमाल न करना, एक-दूसरे से पासवर्ड या डिवाइस एक्सेस न छिपाना, और डिजिटल दुनिया से परे वास्तविक समय एक-दूसरे के साथ बिताना।
मनोवैज्ञानिकों का कहना है कि स्मार्टफोन की लत इंसान को अपने पार्टनर के साथ भावनात्मक रूप से मौजूद रहने से रोकती है, जिसे 'तकनीकी व्यवधान' कहा जाता है। जब आप अपने पार्टनर के सामने बैठकर भी स्क्रीन पर उंगलियां चला रहे होते हैं, तो यह अनजाने में सामने वाले के मन में उपेक्षा और अविश्वास का बीज बो देता है।
अगर समय रहते इस डिजिटल दूरी और अविश्वास को नहीं पहचाना गया, तो आने वाले समय में इंसानी समाज से आत्मीयता और गहरे रिश्तों का वजूद ही खतरे में पड़ जाएगा। वर्चुअल दुनिया के मुगालते में असली रिश्तों की बलि देना आज के इंसान की सबसे बड़ी भूल साबित हो रही है।
अंततः, स्मार्टफोन्स, एल्गोरिदम और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस के इस अभूतपूर्व युग में इंसानी प्यार और आत्मीयता को बचाए रखने के लिए बहुत ज्यादा सजगता और प्रयास की जरूरत है। तकनीक चाहे कितनी भी बदल जाए और कितनी भी आधुनिक हो जाए, लेकिन इंसानी रिश्ते की नीव आज भी ईमानदारी, खुलेपन, वफादारी और बिना शर्त सम्मान पर ही टिकी होती है।
अगर हम जीरो ट्रस्ट के इस कठिन दौर में भी एक-दूसरे के प्रति पारदर्शी, सच्चे और पूरी तरह जवाबदेह बनने की कोशिश करें, तभी हमारे आधुनिक रिश्ते इस डिजिटल तूफान में टिक पाएंगे और सही मायनों में लंबे समय तक जीवित रह सकेंगे।