7.8% ग्रोथ लेकिन हर पांचवां युवा बेरोज़गार — भारत की अर्थव्यवस्था किसके लिए बढ़ रही है?

मार्च 2026 में खत्म हुई तिमाही में भारत की जीडीपी 7.8% की दर से बढ़ी। पूरे वित्त वर्ष 2025-26 के लिए यह आंकड़ा 7.7% रहा — कोविड के बाद की रिकवरी के बाद सबसे तेज़ ग्रोथ। सरकार इसे दुनिया की सबसे तेज़ बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्था बताकर गर्व से पेश कर रही है, और आंकड़े झूठ नहीं बोल रहे। लेकिन इसी हफ्ते जब रोज़गार के आंकड़े सामने आए, तो तस्वीर उतनी सीधी नहीं रही।
जुलाई 2026 में देश की बेरोज़गारी दर घटकर 5.1% पर आ गई, जो पिछले चार महीनों में सबसे कम है। श्रम बल भागीदारी दर भी बढ़कर 55.4% हो गई। सतह पर देखें तो यह अच्छी खबर है — ज़्यादा लोग काम की तलाश में निकल रहे हैं और उन्हें काम मिल भी रहा है। लेकिन इसी रिपोर्ट के भीतर एक दूसरी कहानी छिपी है, जो उतनी सुर्खियां नहीं बटोरती। शहरी महिलाओं में बेरोज़गारी दर 8.7% है — पुरुषों के 5.8% से लगभग दोगुनी। और युवाओं में, यानी 15 से 29 साल के तबके में, बेरोज़गारी दर 18-19% के आसपास बनी हुई है। मतलब हर पांचवां युवा भारतीय, जो काम करने को तैयार है और तलाश रहा है, उसे कोई नौकरी नहीं मिल रही।
यह अंतर्विरोध नया नहीं है, लेकिन इस हफ्ते के आंकड़ों ने इसे फिर से सामने ला दिया है — तेज़ ग्रोथ और स्थिर बेरोज़गारी की औसत दर के बावजूद, नौकरी की गुणवत्ता और युवाओं तक इसका फायदा पहुंचना, दोनों अलग सवाल हैं।
ग्रोथ का गणित और रोज़गार का गणित अलग क्यों है
जीडीपी ग्रोथ मापती है कि अर्थव्यवस्था में कुल कितना उत्पादन और मूल्य जुड़ा। यह यह नहीं बताती कि वह मूल्य किसने बनाया और किसे मिला। पिछले कुछ सालों में भारत की ग्रोथ का बड़ा हिस्सा उन क्षेत्रों से आया है जो पूंजी-गहन हैं — यानी जहां मशीनें, तकनीक और निवेश ज़्यादा काम करते हैं, इंसानी हाथ कम। बड़ी फैक्ट्रियां, आईटी सेवाएं, वित्तीय सेवाएं — ये सेक्टर मुनाफ़ा और उत्पादन तेज़ी से बढ़ाते हैं, लेकिन उतनी ही तेज़ी से नौकरियां पैदा नहीं करते।
दूसरी तरफ, EPFO के औपचारिक रोज़गार आंकड़े दिखाते हैं कि पिछले कुछ सालों में औपचारिक क्षेत्र में नामांकन बढ़ा है — 2017-18 में हर महीने औसतन 6 लाख नए सब्सक्राइबर जुड़ते थे, अब यह संख्या करीब 15 लाख प्रति माह तक पहुंच गई है। यह भी एक सच है, और इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता। लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितनी नौकरियां स्थायी, अच्छी तनख्वाह वाली हैं, और कितनी कॉन्ट्रैक्ट या गिग आधारित। नियमित वेतन वाली नौकरियों — जो सबसे सुरक्षित मानी जाती हैं — का हिस्सा कुल कार्यबल में स्थिर बना हुआ है, बढ़ नहीं रहा। यानी जितने नए लोग काम पर लग रहे हैं, उनमें से बड़ा हिस्सा असुरक्षित, अस्थायी या कम वेतन वाले काम में जा रहा है।
असली समस्या: किस तरह की नौकरियां बन रही हैं
यह बहस सिर्फ आंकड़ों की बाज़ीगरी नहीं है, यह लाखों परिवारों की असली ज़िंदगी का सवाल है। जब कोई 24 साल का ग्रेजुएट डिग्री लेकर घर बैठा है, तो उसके लिए यह मायने नहीं रखता कि देश की जीडीपी 7.8% बढ़ी है। उसके लिए मायने रखता है कि उसे एक ऐसी नौकरी मिले जो उसके खर्च चला सके, कुछ बचत करने दे, और भविष्य की कोई गारंटी दे। जब शहरी महिलाओं में बेरोज़गारी दर पुरुषों से लगभग दोगुनी है, तो यह सिर्फ एक आंकड़ा नहीं, यह बताता है कि आर्थिक विकास का फायदा समाज के हर हिस्से तक बराबर नहीं पहुंच रहा।
मेरी राय में, यह अंतर्विरोध — ऊंची ग्रोथ, लेकिन असमान और अस्थिर रोज़गार — भारत की अर्थव्यवस्था की सबसे बड़ी चुनौती है, महंगाई या रुपये की कमज़ोरी से भी बड़ी। महंगाई और रुपया साल-दर-साल ऊपर-नीचे होते रहते हैं, लेकिन अगर एक पूरी पीढ़ी को शुरुआती सालों में अच्छी नौकरी नहीं मिलती, तो उसका असर दशकों तक रहता है — कम बचत, देर से शादी और घर खरीदने के फैसले, और अगली पीढ़ी की शिक्षा पर भी असर।
सरकार का तर्क यह है कि तेज़ ग्रोथ ही रोज़गार पैदा करने का सबसे भरोसेमंद रास्ता है, और समय के साथ फायदा नीचे तक पहुंचेगा। यह पूरी तरह गलत भी नहीं है — बिना ग्रोथ के तो नौकरियां बनेंगी ही नहीं। लेकिन 'फायदा नीचे तक अपने आप पहुंच जाएगा' वाली सोच पर सिर्फ भरोसा करना काफी नहीं है, जब आंकड़े खुद बता रहे हों कि युवाओं और महिलाओं तक यह फायदा धीमी रफ्तार से पहुंच रहा है।
क्या यह सिर्फ एक चरण है, या संरचनात्मक समस्या
कुछ अर्थशास्त्री इसे 'चरण' कहकर टाल देते हैं — कहते हैं कि जैसे-जैसे अर्थव्यवस्था औपचारिक होगी, मैन्युफैक्चरिंग बढ़ेगी, और नई तकनीकों में निवेश परिपक्व होगा, रोज़गार अपने आप बेहतर होगा। यह उम्मीद जायज़ है, लेकिन इस पर आंख मूंदकर भरोसा करना खतरनाक भी है। दुनिया के कई देशों ने देखा है कि पूंजी-गहन ग्रोथ का रास्ता एक बार पकड़ लेने के बाद उससे मज़दूर-गहन रास्ते पर लौटना आसान नहीं होता — निवेश, नीति और उद्योगों की आदतें उसी ढांचे के इर्द-गिर्द बन जाती हैं।
इसलिए ज़रूरी है कि नीति बनाने वालों की प्राथमिकता सूची में सिर्फ 'जीडीपी नंबर' ऊपर न रहे, बल्कि 'कितनी अच्छी नौकरियां बनीं' भी उतनी ही अहमियत से देखा जाए। मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा, छोटे और मझोले उद्योगों को कर्ज़ तक आसान पहुंच, कौशल प्रशिक्षण को बाज़ार की असली मांग से जोड़ना, और महिलाओं के काम पर लौटने के लिए सुरक्षित व सुलभ परिवहन-चाइल्डकेयर जैसी बुनियादी सुविधाएं — ये सब उतने ही ज़रूरी सुधार हैं जितना निवेश आकर्षित करना।
आखिर में बात इतनी सी है
जीडीपी की रफ़्तार पर तालियां बजाना आसान है, क्योंकि यह एक बड़ा, चमकदार नंबर है जो अखबार की हेडलाइन बनता है। लेकिन असली सवाल यह नहीं कि अर्थव्यवस्था कितनी तेज़ बढ़ रही है — असली सवाल यह है कि वह किसके लिए बढ़ रही है। जब तक हर पांचवां युवा नौकरी की तलाश में भटक रहा है और शहरी महिलाओं की बेरोज़गारी पुरुषों से दोगुनी है, तब तक 7.8% का आंकड़ा जश्न मनाने से ज़्यादा आत्ममंथन की मांग करता है। ग्रोथ ज़रूरी है, लेकिन ग्रोथ अकेले काफी नहीं — जब तक वह हर घर की मेज़ तक रोटी, हर हाथ तक काम, और हर युवा तक उम्मीद लेकर न पहुंचे।