महंगाई पर मोदी सरकार से जनता का बड़ा सवाल

महंगाई पर मोदी सरकार से जनता का बड़ा सवाल
महंगाई ऐसा मुद्दा है जिसका असर किसी एक वर्ग तक सीमित नहीं रहता।
रसोई का सामान महंगा होता है तो उसका असर गरीब से लेकर मध्यम वर्ग तक पहुंचता है।
दूध, सब्जी, दाल, तेल, गैस, पेट्रोल और बच्चों की पढ़ाई जैसे खर्च सीधे घर के बजट को प्रभावित करते हैं।
यही वजह है कि चुनावी राजनीति में महंगाई हमेशा एक बड़ा मुद्दा रही है।
इसी मुद्दे को लेकर सोशल मीडिया पर एक पोस्ट तेजी से चर्चा में है।
पोस्ट में पुराने राजनीतिक वादों का हवाला देते हुए सवाल पूछा गया है कि महंगाई कम करने का दावा कितना पूरा हुआ।
पोस्ट की भाषा में आरोप है कि महंगाई खत्म करने के बजाय जनता पर महंगाई का बोझ और बढ़ गया।
इसके साथ लोगों से दो शब्दों में जवाब देने को भी कहा गया है।
लेकिन इस सवाल का जवाब केवल राजनीतिक नारों से नहीं दिया जा सकता।
इसके लिए यह समझना जरूरी है कि महंगाई को मापने का तरीका क्या है।
महंगाई की दर बढ़ना और वस्तुओं की कीमत दस गुना बढ़ जाना एक ही बात नहीं होती।
इसी अंतर को समझे बिना महंगाई पर होने वाली बहस अधूरी रह जाती है।
महंगाई का सरकारी आंकड़ा क्या कहता है?
नई दिल्ली /05 सितंबर 2026 /अटल हिन्द न्यूज रिसोर्स
मित्रों, एक पुरानी बात याद आती है। भाजपा वाले कहते थे—जब हमारी सरकार आएगी तो कांग्रेस ने जो महंगाई बढ़ाई है, हम उस महंगाई से हिंदुस्तान को मुक्त कर देंगे। 2014 के चुनाव के समय यह बात बार-बार कही गई। घोषणापत्र में भी महंगाई नियंत्रित करने को प्राथमिकता दी गई थी। प्राइस स्टेबलाइजेशन फंड, जमाखोरी रोकने के उपाय और कृषि बाजार सुधार जैसे वादे थे।
अब सवाल उठता है—क्या वाकई महंगाई से मुक्ति मिली? या हालात अलग रहे? यह चर्चा सिर्फ आरोप-प्रत्यारोप की नहीं, आंकड़ों और रोजमर्रा की जिंदगी की है। आसानी से समझते हैं।
कांग्रेस की यूपीए सरकार (2004-2014) के दौरान खुदरा महंगाई का औसत करीब 8.1 से 8.2 प्रतिशत रहा। खासकर यूपीए-2 में कई महीने डबल डिजिट यानी 10 प्रतिशत से ऊपर चली गई। खाद्य महंगाई तो और तेज थी। आम परिवार को सब्जी, दाल, तेल के दाम रोज चिंता देते थे। वैश्विक संकट और घरेलू नीतियों का असर दोनों था।
2014 के बाद एनडीए सरकार आई। आधिकारिक आंकड़ों के मुताबिक औसत खुदरा महंगाई करीब 5.1 प्रतिशत के आसपास रही। कई सालों में यह 5 प्रतिशत के नीचे भी रही। हाल के आंकड़ों में 2025-26 में कई महीने 2 से 4 प्रतिशत के आसपास देखे गए। जुलाई 2026 में करीब 4.45 प्रतिशत दर्ज हुई। आरबीआई का लक्ष्य 4 प्रतिशत के आसपास रहता है, जिसमें 2-6 प्रतिशत की सीमा है।
यहां साफ बात है। “दस गुना बढ़ाकर लूट लिया” वाला आरोप आंकड़ों से मेल नहीं खाता। औसत दर वास्तव में कम रही। लेकिन सिर्फ औसत देखने से काम नहीं चलता। लोगों को महसूस होती है रोज की चीजें—प्याज, टमाटर, दूध, गैस सिलेंडर, पेट्रोल। कभी-कभी ये तेजी से बढ़ जाते हैं। कोविड काल में वैश्विक कीमतों का असर पड़ा। रूस की कीमतें, मौसम का असर, आपूर्ति की समस्याएं भी भूमिका निभाती हैं।
भाजपा की तरफ से कहा जाता है कि यूपीए में डबल डिजिट महंगाई आम थी, जबकि उनके समय में ज्यादातर 5-6 प्रतिशत के आसपास नियंत्रित रही। व्हाइट पेपर और आधिकारिक तुलनाओं में यह बात दोहराई गई। अमित शाह और अन्य नेताओं ने भी यही कहा कि पहले की तुलना में नियंत्रण बेहतर है। मुफ्त राशन योजना, अनाज वितरण और कुछ बाजार सुधारों का जिक्र किया जाता है।
विपक्ष यानी कांग्रेस और अन्य दल कहते हैं कि आम आदमी की जेब अभी भी दब रही है। एलपीजी सिलेंडर के दाम समय-समय पर बढ़े। पेट्रोल-डीजल में भी उतार-चढ़ाव रहा। खाद्य तेल, दाल जैसी चीजों में कभी-कभी तेज उछाल आता है। मेडिकल खर्च बढ़ने की बात भी उठती है। वे कहते हैं कि वादा पूरा नहीं हुआ और महंगाई का बोझ गरीब-मध्यम वर्ग पर है।
दोनों तरफ के तर्क सुनने चाहिए। महंगाई सिर्फ सरकार की नीति से नहीं तय होती। अंतरराष्ट्रीय कच्चा तेल, मौसम, मांग-आपूर्ति, मौद्रिक नीति (आरबीआई की ब्याज दरें) सब मिलकर काम करते हैं। भारत में खाद्य महंगाई का हिस्सा बड़ा होता है क्योंकि गरीब परिवार की आय का बड़ा हिस्सा खाने पर जाता है। इसलिए सब्जी-फल के दाम बढ़ते ही महसूस होता है कि महंगाई बढ़ गई।
आंकड़ों को देखते हुए औसत मुद्रास्फीति कम हुई है। लेकिन लोग पूछते हैं—क्या जीवन आसान बना? रोजगार, आय बढ़ोतरी और कीमतों का संतुलन कितना बेहतर है? प्रति व्यक्ति आय बढ़ी है, कई योजनाएं चलीं, लेकिन महंगाई का असर अलग-अलग वर्गों पर अलग पड़ता है। शहर और गांव में भी फर्क दिखता है।
2014 से पहले की स्थिति को याद करें तो कई विशेषज्ञ कहते हैं कि अर्थव्यवस्था नाजुक थी। ऊंची महंगाई, ऊंचा राजकोषीय घाटा, बैंकिंग क्षेत्र की समस्याएं। बाद में कुछ सुधार हुए, इंफ्रास्ट्रक्चर बढ़ा, डिजिटल भुगतान फैला। लेकिन चुनौतियां बाकी हैं। कृषि उत्पादन में उतार-चढ़ाव, जलवायु परिवर्तन का असर और वैश्विक अनिश्चितताएं अभी भी महंगाई को प्रभावित करती हैं।
आम बोलचाल में बात करें तो दुकान पर जाते समय प्याज के दाम पूछना, गैस का बिल देखना—ये रोज की बातें हैं। सरकार कहती है नियंत्रण में है, विपक्ष कहता है बोझ बढ़ रहा है। सच्चाई कहीं बीच में है। औसत आंकड़े एक तस्वीर दिखाते हैं, रोजमर्रा का अनुभव दूसरी। “मुक्त कर देंगे” वाला वादा पूरा नियंत्रण का था, लेकिन पूर्ण मुक्ति किसी भी अर्थव्यवस्था में मुश्किल है। महंगाई हमेशा रहती है, सवाल है कितनी नियंत्रित।
अन्य स्रोतों से देखें तो हाल के महीनों में खाद्य महंगाई कभी-कभी ऊपर गई। चीनी, कुछ सब्जियों के दाम बढ़े। विपक्ष ने इन पर सवाल उठाए। सरकार ने कहा कि समग्र स्थिति बेहतर है और राहत उपाय चल रहे हैं। आरबीआई ब्याज दरों से मांग नियंत्रित करने की कोशिश करता है। सब्सिडी और मुफ्त अनाज जैसी योजनाएं गरीब परिवारों को कुछ राहत देती हैं।
लंबे समय में देखें तो 1947 से अब तक अलग-अलग प्रधानमंत्रियों के काल में महंगाई के पैटर्न बदले। 2014 के बाद औसत कम और ज्यादा स्थिर दिखता है। लेकिन “दस गुना” वाली बात गलत है। आंकड़े उल्टा बताते हैं। फिर भी लोगों की शिकायतें जायज हैं क्योंकि जीवनयापन की लागत बढ़ी है। आय भी बढ़ी, लेकिन कई परिवारों के लिए संतुलन मुश्किल बना रहता है।
दो शब्द में जवाब की मांग है तो सीधा कहें—आंकड़े नियंत्रित दिखाते हैं, लेकिन महसूस होती महंगाई अलग कहानी सुनाती है। वादे और हकीकत के बीच का फासला राजनीति का हिस्सा है। जनता तय करेगी कि किसकी बात ज्यादा सही लगती है। महंगाई पर बहस जारी रहेगी क्योंकि यह हर घर को छूती है। आसान भाषा में यही सार है—वादा बड़ा था, नियंत्रण हुआ, लेकिन पूर्ण मुक्ति नहीं मिली और चुनौतियां बाकी हैं।
(लेख में तथ्यात्मक तुलना यूपीए-एनडीए आंकड़ों, आधिकारिक बयानों और हाल के सीपीआई आंकड़ों पर आधारित है। राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से ऊपर उठकर आम समझ के लिए लिखा गया।)