बचतकर्ता बनाम कर्जदार: RBI की चुप्पी किसे बचा रही है?

बचतकर्ता बनाम कर्जदार: RBI की चुप्पी किसे बचा रही है?

अगस्त 2026 की मौद्रिक नीति समिति (MPC) की बैठक में रिज़र्व बैंक ने रेपो रेट को लगातार तीसरी बार 5.25% पर बरकरार रखा। ज़्यादातर अर्थशास्त्रियों का अनुमान है कि यह दर 2026 के बाकी महीनों में भी नहीं हिलेगी। सतह पर यह स्थिरता की खबर लगती है—न EMI बढ़ेगी, न घटेगी। लेकिन असली कहानी सतह के नीचे है। फरवरी 2025 से जून 2026 के बीच RBI ने कुल 125 बेसिस पॉइंट रेपो रेट घटाई थी, और उस कटौती का असर बैंकों ने बराबर नहीं बांटा। यही असंतुलन आज बचतकर्ता और कर्जदार के बीच एक अनकही खींचतान बन गया है, और यह खींचतान आम मध्यवर्गीय परिवार की जेब में सीधे उतर रही है।

आंकड़े क्या कहते हैं

RBI के अपने आंकड़े इस असमानता को साफ दिखाते हैं। फरवरी 2025 से जून 2026 के बीच बकाया लोन पर ब्याज दरें औसतन 91 बेसिस पॉइंट गिरीं, जबकि बकाया जमा यानी FD पर ब्याज दरें सिर्फ 51 बेसिस पॉइंट घटीं। नए लोन की दरें 80 बेसिस पॉइंट सस्ती हुईं, जबकि नई जमाओं पर दरें 63 बेसिस पॉइंट ही घटीं। मतलब साफ है—जब दरें घटानी हों तो बैंक कर्जदार को राहत जल्दी देते हैं, लेकिन जब बचतकर्ता को मुनाफा बांटना हो तो हाथ धीरे खुलता है।

बैंक FD ब्याज दर में गिरावट दिखाता प्रमाणपत्र और ग्राफ
बकाया जमा दरें सिर्फ 51 बेसिस पॉइंट घटीं, जबकि लोन दरें 91 बेसिस पॉइंट सस्ती हुईं (फोटो: SchmiAlf / CC BY-SA 4.0)

नतीजा यह है कि प्राइवेट बैंकों की सीनियर सिटीजन FD दरें अब घटकर करीब 6.6% से 6.8% रह गई हैं, जबकि कुछ महीने पहले तक यह 7.5% से 8% तक मिल जाती थी। सिर्फ कुछ छोटे फाइनेंस बैंक अब भी 7.5-8% दे रहे हैं, वह भी सीमित अवधि और जोखिम के साथ। इसी दौरान बैंक क्रेडिट जून 2026 तक सालाना 18.6% की रफ्तार से बढ़ा, जबकि डिपॉज़िट ग्रोथ सिर्फ 13.3% रही। यानी बैंक कर्ज तेज़ी से बांट रहे हैं, लेकिन उतनी ही तेज़ी से बचत जुटा नहीं पा रहे। इसी दबाव में बैंकों का नेट इंटरेस्ट मार्जिन जून 2025 के 3.26% से घटकर जून 2026 में 3.21% पर आ गया।

जिसकी जेब हल्की, उसी पर कर्ज का बोझ ज़्यादा

यहीं सबसे चिंताजनक हिस्सा शुरू होता है। जब सुरक्षित बचत पर रिटर्न घट रहा है, तो बहुत से लोग—खासकर युवा वर्ग—बचत छोड़कर उधार की तरफ मुड़ रहे हैं। मार्च 2026 तक देश का बकाया क्रेडिट कार्ड कर्ज बढ़कर करीब 3.1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच गया, और 90 से 360 दिन तक बकाया डिफॉल्ट यानी डिलीक्वेंसी सालाना आधार पर 40% से ज़्यादा बढ़ी है। छोटी अवधि के पर्सनल लोन में डिलीक्वेंसी मार्च 2026 तक 6.4% पर पहुंच चुकी है, और इनमें से लगभग आधे लोन 35 साल से कम उम्र के कर्जदारों को दिए गए हैं।

असुरक्षित यानी अनसिक्योर्ड रिटेल लोन का ग्रॉस NPA अनुपात 1.7% है, जो सिक्योर्ड लोन के 0.7% से करीब ढाई गुना ज़्यादा है। खुद RBI की फाइनेंशियल स्टेबिलिटी रिपोर्ट में यह स्वीकार किया गया है कि कम रेटिंग वाले कर्जदारों के बीच कर्ज बढ़ने की रफ्तार, बनावट और चुकाने की क्षमता पर "बारीकी से नजर" रखने की ज़रूरत है। यानी जिस तबके की आमदनी सबसे कम भरोसेमंद है, वही तबका सबसे तेज़ी से क्रेडिट कार्ड और बाय-नाउ-पे-लेटर के जाल में फंस रहा है।

यह सिर्फ आंकड़ों की बात नहीं, नीयत की बात है

मेरी राय में यह महज संयोग नहीं, बल्कि नीति की दिशा है। बैंकों के लिए कर्ज बांटना मुनाफे का सीधा ज़रिया है—हर नया लोन, हर नया क्रेडिट कार्ड, बैलेंस शीट को बढ़ाता है। इसलिए दरें घटते ही कर्ज सस्ता करने में देरी नहीं होती। लेकिन बचतकर्ता को ऊंचा ब्याज देना बैंक के मार्जिन पर सीधा दबाव बनाता है, इसलिए वहां कंजूसी बरती जाती है। जब रिज़र्व बैंक रेपो रेट स्थिर रखकर "तटस्थता" दिखाता है, तब भी व्यवहार में यह तटस्थता नहीं है—यह एक ऐसी व्यवस्था है जो कर्ज की मांग को हवा देती रहती है, जबकि बचत करने वाले नागरिक की क्रय शक्ति चुपचाप घिसती रहती है।

सोचिए एक रिटायर्ड शख्स की स्थिति, जिसकी पूरी जिंदगी की जमा-पूंजी FD में है। ब्याज दर हर साल थोड़ी घटती जाती है, जबकि रोज़मर्रा का खर्च उसी रफ्तार से नहीं घटता। दूसरी तरफ एक 26 साल का युवक, जिसकी सैलरी सीमित है, लेकिन क्रेडिट कार्ड की लिमिट आसानी से बढ़ती जाती है, BNPL ऐप एक क्लिक पर कर्ज देने को तैयार है। यह दो तस्वीरें एक ही अर्थव्यवस्था की हैं, और दोनों के बीच का फासला हर तिमाही चौड़ा हो रहा है।

युवा भारतीय स्मार्टफोन पर क्रेडिट कार्ड से ऑनलाइन खरीदारी करते हुए
मार्च 2026 तक बकाया क्रेडिट कार्ड कर्ज करीब 3.1 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा (फोटो: Indraprakashinfo / CC BY-SA 4.0)

समाधान कठिन नहीं, इच्छाशक्ति की कमी है

RBI के पास औज़ार मौजूद हैं। असुरक्षित पर्सनल लोन और क्रेडिट कार्ड कर्ज के लिए जोखिम भार (रिस्क वेटेज) पहले भी बढ़ाया जा चुका है, और ज़रूरत पड़ने पर इसे और सख्त किया जा सकता है ताकि बैंक-NBFC फिर से सोच-समझकर कर्ज बांटें। साथ ही बैंकों के लिए यह अनिवार्य किया जाना चाहिए कि रेपो रेट में हुए किसी भी बदलाव का असर जमा दरों और कर्ज दरों पर लगभग बराबर अनुपात में और तय समय-सीमा के भीतर दिखे—जैसे एक्सटर्नल बेंचमार्क आधारित लोन में होता है, वैसा ही अनुशासन जमा दरों पर भी लागू हो। कार्ड जारी करने से पहले आय-सत्यापन और क्रेडिट स्कोर की न्यूनतम शर्तें कड़ी करना, तथा नई कार्ड ग्रोथ पर निगरानी बढ़ाना भी ज़रूरी कदम हैं। कार्ड जुड़ने की रफ्तार FY24 के 19% से घटकर FY26 में करीब 8% रह गई है, यानी उद्योग खुद भी सतर्क होना शुरू हो चुका है—अब नीति को इस सतर्कता को नियम में बदलना चाहिए, स्वैच्छिक भरोसे पर नहीं छोड़ना चाहिए।

आखिरी बात

एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था वह नहीं है जहां कर्ज लेना आसान हो और बचत करना घाटे का सौदा—एक स्वस्थ अर्थव्यवस्था वह है जहां दोनों को बराबर सम्मान मिले। आज की स्थिति में बचतकर्ता चुपचाप सब्सिडी दे रहा है उस कर्ज-आधारित उपभोग को, जिसकी नींव उतनी मजबूत नहीं जितनी दिखाई देती है। जब तक जमा दरें और कर्ज दरें एक ही रफ्तार से नहीं चलेंगी, तब तक यह असंतुलन सिर्फ आंकड़ों में नहीं, आम आदमी के भरोसे में भी दरार डालता रहेगा। RBI को अब यह तय करना होगा कि वह सिर्फ महंगाई और विकास दर का पहरेदार है, या उस आम बचतकर्ता का भी, जिसकी जमा-पूंजी पर पूरा बैंकिंग तंत्र टिका है।

कवर फोटो: Vyacheslav Argenberg / CC BY 4.0

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