व्यवहार जाल: शेयर बाजार में नुकसान से कैसे बचें?

-व्यवहार जाल : बाजार में सबसे बड़ा ठग आपका अपना दिमाग है!
शेयर बाजार में लोग अक्सर कहते हैं कि उन्हें बाजार ने लूट लिया। यह बात आधी सही है। बाजार बेचारा किसी को नहीं लूटता, वह तो सिर्फ सामने रखे अवसर और खतरे दिखाता है। असली लूटेरा अक्सर हमारे सिर के भीतर बैठा होता है—वही दिमाग, जो पांच मिनट पहले तक खुद को चाणक्य समझ रहा था और पांच मिनट बाद किसी व्हाट्सऐप ग्रुप के ‘मार्केट गुरु’ के चरणों में बैठ जाता है। निवेश की दुनिया में सबसे खतरनाक जाल कोई मंदी, घोटाला या बाजार दुर्घटना नहीं, बल्कि मनुष्य का अपना व्यवहार है।
अर्थशास्त्र ने वर्षों तक मान लिया कि निवेशक तर्कसंगत होता है। फिर व्यवहारिक अर्थशास्त्र ने आकर बताया कि निवेशक तर्कसंगत कम और भावुक ज्यादा होता है—वह नुकसान में आशावादी, मुनाफे में अधीर और सलाह के मामले में अत्यंत चयनात्मक होता है। यानी जहां अपनी गलती स्वीकार करनी हो वहां वह दार्शनिक बन जाता है और जहां मुनाफा हो वहां तुरन्त भगवान को धन्यवाद देकर बेच देता है।
सबसे पहला जाल है एंकरिंग। आपने कोई शेयर 500 रुपये में खरीदा और अब वह 280 का हो गया। दिमाग कहता है,“500 तो वापस आएगा ही।” क्यों आएगा? क्या कंपनी के बोर्ड ने आपके खरीद मूल्य की शपथ ले रखी है? बाजार को आपके 500 रुपये से कोई भावनात्मक लगाव नहीं है। शेयर का आज का मूल्य उसके भविष्य से तय होगा, आपके पुराने खरीद मूल्य से नहीं। फिर आता है डूबत लागत का जाल। आदमी टूटे हुए निवेश को इसलिए पकड़े रहता है क्योंकि उसे लगता है कि बेच दिया तो अपनी गलती स्वीकार करनी पड़ेगी।
यही वह मानसिकता है जिसमें लोग खराब शेयर को ‘लंबी अवधि का निवेश’ और अच्छे शेयर को ‘मुनाफावसूली का अवसर’ कहते हैं। घाटे में पड़ा शेयर अचानक परिवार का सदस्य बन जाता है “इसे छोड़ेंगे नहीं, बहुत पुराना रिश्ता है।” बाजार में रिश्तेदारी निभाने की सबसे महंगी जगह यही है। इसके बाद आता है पुष्टिकरण पूर्वाग्रह। आपने शेयर खरीद लिया, अब आपको केवल वही खबर अच्छी लगती है जो आपके फैसले को सही साबित करे। कंपनी का मुनाफा घटा तो कहते हैं,“यह अस्थायी है।” कर्ज बढ़ा तो,“विस्तार कर रही है।” प्रमोटर पर सवाल उठा तो,“प्रतिद्वंद्वी बदनाम कर रहे हैं।” और अगर कंपनी का शेयर 40 प्रतिशत गिर जाए तो अंतिम तर्क आता है “बाजार को समझ ही नहीं है।” यानी गलती हमारी नहीं, पूरी दुनिया मूर्ख है। यही आत्मविश्वास धीरे-धीरे ओवरकॉन्फिडेंस में बदल जाता है।
कुछ निवेशक दो-चार सौदे सही हो जाने के बाद खुद को वॉरेन बफेट का भारतीय संस्करण समझने लगते हैं। फिर वे सलाह लेना अपमान समझते हैं। समस्या यह है कि बाजार में पिछली सफलता अगली सफलता की गारंटी नहीं होती। सिक्का पांच बार चित आने के बाद छठी बार पट आने की संभावना इसलिए नहीं बढ़ जाती कि आपने पांच बार सही अनुमान लगाया था। मगर हमारा दिमाग आंकड़ों से ज्यादा अपनी कहानी पर भरोसा करता है।
लॉस एवर्जन, यानी नुकसान का दर्द मुनाफे की खुशी से ज्यादा महसूस होना, निवेशक को और विचित्र बना देता है। सौ रुपये कमाने पर जितनी खुशी होती है, सौ रुपये खोने पर उससे कहीं ज्यादा बेचैनी होती है। इसलिए निवेशक नुकसान वाले शेयर को पकड़े रहता है और मुनाफे वाले शेयर को जल्दी बेच देता है। इसे व्यवहारिक वित्त में डिस्पोजिशन इफेक्ट से जोड़ा जाता है,नुकसान को टालना और छोटे मुनाफे को जल्दी साकार कर लेना।
बाजार में यही वह कला है जिसमें आदमी खरपतवार को पानी देता रहता है और फूल उखाड़कर घर ले आता है। एक और बड़ा जाल है हर्ड बिहेवियर, यानी भीड़ का अनुसरण। कोई शेयर इसलिए खरीद लिया क्योंकि पड़ोसी ने खरीदा, दोस्त ने खरीदा, टीवी पर किसी विशेषज्ञ ने कहा और सोशल मीडिया पर हजार लोग उसके स्क्रीनशॉट डाल रहे हैं। निवेशक को लगता है कि इतनी भीड़ गलत नहीं हो सकती। इतिहास बताता है कि भीड़ गलत हो सकती है और बहुत शानदार ढंग से गलत हो सकती है।
डॉट-कॉम बुलबुला हो, 2008 का वैश्विक वित्तीय संकट हो या किसी लोकप्रिय शेयर में अंधी तेजी,लोग अक्सर तब सबसे ज्यादा आश्वस्त होते हैं जब सावधान होने की सबसे ज्यादा जरूरत होती है। रिलेटिविटी ट्रैप भी कम मजेदार नहीं है। आपका दोस्त साल में 30 प्रतिशत कमा रहा है और आप 12 प्रतिशत। बस, आपका निवेश आपको बेकार लगने लगता है। लेकिन उसके जोखिम, आय, उम्र, लक्ष्य और आर्थिक स्थिति आपकी जैसी है क्या? निवेश कोई स्कूल की परीक्षा नहीं कि जिसके सबसे ज्यादा अंक आए वही सबसे बुद्धिमान। किसी की तेज रफ्तार आपके लिए दुर्घटना का निमंत्रण हो सकती है।
फिर आता है फियर ऑफ मिसिंग आउट,FOMO। शेयर भाग रहा है और आप बाहर बैठे हैं तो बेचैनी होने लगती है। लगता है कि अभी नहीं खरीदा तो जिंदगी भर पछताएंगे। आदमी बाजार में अवसर छूटने से इतना डरता है कि कई बार पैसा ही गंवा बैठता है। असल में बाजार रोज नए अवसर पैदा करता है; लेकिन हमारी अधीरता रोज नया नुकसान पैदा करने में सक्षम है। व्यवहार जाल का सबसे खतरनाक रूप है परिस्थितिजन्य अंधापन।
जब निवेशक अपनी पसंदीदा कंपनी के बारे में बुरी खबर पढ़ता है तो वह स्रोत पर सवाल उठाता है, लेकिन अच्छी खबर आते ही उसे प्रमाणपत्र मान लेता है। यही कारण है कि निवेश में जानकारी से ज्यादा जरूरी है जानकारी को असुविधाजनक होने पर भी स्वीकार करने की क्षमता। बाजार में सबसे कठिन वाक्य “मैं गलत था” है। लेकिन यही वाक्य कई बार सबसे ज्यादा पैसा बचाता है।
इसलिए निवेश का पहला नियम शायद यह होना चाहिए कि शेयर खरीदने से पहले अपने दिमाग की जांच कराइए। पूछिए,मैं यह शेयर क्यों खरीद रहा हूं? अगर मेरी धारणा गलत साबित हो जाए तो मैं क्या करूंगा? क्या मैं विरोधी जानकारी भी पढ़ रहा हूं? क्या मैं भीड़ के साथ जा रहा हूं? क्या मुझे कंपनी पसंद है या उसका शेयर? और सबसे जरूरी,अगर आज मेरे पास यह शेयर नहीं होता तो क्या मैं इसे आज खरीदता? यदि उत्तर ‘नहीं’ है तो केवल पुराने निवेश की इज्जत बचाने के लिए उसे पकड़े रहना समझदारी नहीं, भावनात्मक जिद है।
निवेश में असली बुद्धिमानी भविष्य बताने में नहीं, अपनी मूर्खता पहचानने में है। बाजार आपको हर दिन दो चीजें देता है,एक कीमत और एक सबक। कीमत पैसे में मिलती है, सबक अनुभव में। समझदार वही है जो दोनों की रसीद संभालकर रखे। आखिर बाजार में सबसे बड़ा ठग कोई ब्रोकर, कोई विशेषज्ञ या कोई कंपनी नहीं होती। सबसे बड़ा ठग हमारा अपना दिमाग होता है,क्योंकि वह हमें ठगता भी है और विश्वास भी दिलाता है कि फैसला हमने बहुत सोच-समझकर लिया था— सुभाष बुड़ावन वाला,रतलाम.मप्र.