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    Home » महंगाई, मुफ्त राशन, गिरता रुपया और भारत की अर्थव्यवस्था 2014-2026: आम आदमी पर बढ़ता आर्थिक दबाव

    महंगाई, मुफ्त राशन, गिरता रुपया और भारत की अर्थव्यवस्था 2014-2026: आम आदमी पर बढ़ता आर्थिक दबाव

    Janta AwaazBy Janta AwaazMay 19, 20269 Views
    भारत में बढ़ती महंगाई के बीच सब्जी मंडी में महंगे खाद्य पदार्थों की कीमतों से परेशान आम नागरिक
    भारत में बढ़ती महंगाई के बीच सब्जी मंडी में महंगे खाद्य पदार्थों की कीमतों से परेशान आम नागरिक

    भारत की अर्थव्यवस्था: एक विस्तृत शोधपरक विश्लेषण

    2014 से 2026 तक भारत की अर्थव्यवस्था में हुए बड़े बदलावों का विश्लेषण। महंगाई, मुफ्त राशन योजना, पीएम केयर्स फंड, गिरता रुपया, RBI की नीतियाँ और आम नागरिक पर बढ़ते आर्थिक दबाव को समझने का एक शोधपरक लेख।

    लेखक-राजकुमार अग्रवाल

    भारत की अर्थव्यवस्था के बारे में आज दो अलग-अलग तस्वीरें दिखाई देती हैं। पहली तस्वीर सरकारी घोषणाओं, निवेश सम्मेलनों और उच्च विकास दर के दावों की है। दूसरी तस्वीर आम नागरिक के जीवन की है, जहाँ रसोई का खर्च बढ़ रहा है, बच्चों की पढ़ाई महंगी होती जा रही है, स्वास्थ्य सेवाओं की लागत लगातार ऊपर जा रही है और रोजगार की गुणवत्ता को लेकर गंभीर प्रश्न बने हुए हैं। महंगाई केवल आर्थिक आंकड़ा नहीं है; यह हर परिवार के बजट, हर किसान की लागत, हर छोटे व्यापारी की नकदी और हर कर्मचारी की वास्तविक आय से जुड़ा हुआ प्रश्न है।

    2026 में अंतरराष्ट्रीय आर्थिक शोध संस्था ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स ने चेतावनी दी कि वर्ष के अंत तक भारत की महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक के अनुमान से अधिक हो सकती है। यह चेतावनी केवल तकनीकी पूर्वानुमान नहीं है, बल्कि यह संकेत है कि वैश्विक तेल कीमतों, कमजोर रुपये, उर्वरक आपूर्ति, परिवहन लागत और घरेलू आर्थिक दबावों का संयुक्त प्रभाव भारतीय अर्थव्यवस्था को चुनौती दे सकता है।

    यह लेख महंगाई की इस चेतावनी को व्यापक संदर्भ में रखकर देखता है।इसमें 2014 से 2026 तक के आर्थिक परिवर्तनों, रुपये की गिरावट, मुफ्त राशन योजना, पीएमकेयर्स फंड पर सार्वजनिक बहस, बजट नीतियों, आरबीआई की भूमिका और भारत की वैश्विक स्थिति का विश्लेषण किया गया है। उद्देश्य किसी राजनीतिक निष्कर्ष पर पहुंचना नहीं, बल्कि उन आर्थिक प्रश्नों को समझना है जो आज करोड़ों भारतीयों के जीवन को प्रभावित कर रहेहैं।

    ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की चेतावनी
    ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की अर्थशास्त्री अलेक्जेंड्रा हरमन प्रसाद के अनुसार यदि वैश्विक ईंधन कीमतों में केवल 10 प्रतिशत की वृद्धि होती है, तो अगले तीन से चार महीनों में भारत की मुख्य मुद्रास्फीति में 0.3 से 0.4 प्रतिशत तक अतिरिक्त वृद्धि संभव है। उनका अनुमान है कि 2026 की चौथी तिमाही में कोर इन्फ्लेशन 6.4 प्रतिशत तक पहुँच सकता है। यह भारतीय रिजर्व बैंक के अपेक्षाकृत कम अनुमान से अधिक है।

    उनके अनुसार तेल की कीमतें केवल पेट्रोल और डीजल को प्रभावित नहींकरतीं। इनके माध्यम से परिवहन लागत बढ़ती है, जिससे औद्योगिक उत्पादन, होटल, रेस्तरां,कृषि, खाद्य प्रसंस्करण और खुदरा बाजार प्रभावित होते हैं।

    यदि यह दबाव लंबे समय तक बना रहता है, तो उपभोक्ता मूल्य सूचकांक में व्यापक वृद्धि देखी जा सकती है।रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि खाद्य मुद्रास्फीति और उर्वरक आपूर्ति संबंधी जोखिम आने वाले महीनों में कृषि लागत को बढ़ा सकते हैं। खरीफ सीजन के दौरान उर्वरक की उपलब्धता प्रभावित होने पर उत्पादन और कीमत दोनों पर असर पड़ सकता है।

    महंगाई का अर्थ
    महंगाई का सबसे सरल अर्थ है कि समय के साथ वस्तुओं और सेवाओं की कीमतें बढ़ती जाती हैं और मुद्रा की क्रय शक्ति घटती जाती है। यदि किसी परिवार की आय स्थिर रहती है, लेकिन दूध, आटा, गैस, दाल, स्कूल फीस और किराया बढ़ता जाता है, तो उस परिवार की वास्तविक आय कम हो जाती है।

     

    भारत जैसे देश में महंगाई का प्रभाव विशेष रूप से महत्वपूर्ण है क्योंकि बड़ी आबादी सीमित आय पर निर्भर करती है। असंगठित क्षेत्र के मजदूर, छोटे किसान,दुकानदार, पेंशनभोगी और निम्न मध्यम वर्ग कीमतों में बढ़ोतरी को सबसे पहले महसूस करतेहैं। कई बार सांख्यिकीय रूप से महंगाई नियंत्रित दिखाई देती है, लेकिन आम नागरिक का अनुभव अलग हो सकता है क्योंकि उसके खर्च की संरचना खाद्य, ईंधन और शिक्षा जैसे क्षेत्रों पर अधिक आधारित होती है।

    प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत जरूरतमंद परिवार को मुफ्त राशन वितरित करते कर्मचारी
    प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना के तहत जरूरतमंद परिवार को मुफ्त राशन वितरित करते कर्मचारी

    80 करोड़ लोगों को मुफ्त राशन
    पिछले वर्षों में भारत सरकार ने प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना सहित विभिन्न कार्यक्रमों के माध्यम से लगभग 80 करोड़ लोगों को मुफ्त खाद्यान्न उपलब्ध कराया। समर्थकों के अनुसार यह योजना आर्थिक कठिनाई के समय करोड़ों परिवारों के लिए जीवन रेखा साबित हुई। आलोचकों के अनुसार इतनी बड़ी संख्या में लोगों का खाद्य सहायता पर निर्भर होना यह भी संकेत देता है कि आय, रोजगार और क्रय शक्ति संबंधी चुनौतियों अभी भी व्यापक हैं।

    आर्थिक दृष्टि से यह योजना दो तरह के प्रश्न उठाती है। पहला, क्या इतनी बड़ी आबादी की खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करना राज्य की आवश्यक जिम्मेदारी है? दूसरा,क्या यह स्थिति इस बात की ओर संकेत करती है कि बड़ी संख्या में नागरिक बाजार से पर्याप्त भोजन खरीदने की स्थिति में नहीं हैं? इन दोनों प्रश्नों पर सार्वजनिक बहस जारी है।सामाजिक स्तर पर मुफ्त राशन ने भुखमरी और खाद्य असुरक्षा को कमकरने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। लेकिन दीर्घकालिक समाधान रोजगार, उत्पादक आय और कौशल आधारित अवसरों के विस्तार में निहित है।

    पीएम केयर्स फंड और पारदर्शिता पर बहस
    पीएम केयर्स फंड की स्थापना राष्ट्रीय आपदाओं और आपात स्थितियों में संसाधन जुटाने के उद्देश्य से की गई थी। इस फंड के माध्यम से बड़ी मात्रा में धन प्राप्त हुआ और विभिन्न राहत गतिविधियों के लिए उपयोग किया गया। साथ ही, इसकी पारदर्शिता,लेखा परीक्षण और सार्वजनिक जवाबदेही को लेकर कई नागरिकों, पत्रकारों और सामाजिक संगठनों ने प्रश्न उठाए।

    लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी भी सार्वजनिक महत्व की संस्था के बारे में पारदर्शिता की मांग स्वाभाविक मानी जाती है। दूसरी ओर, समर्थक यह तर्क देते हैं कि संकट की घड़ी में त्वरित संसाधन जुटाना और उनका उपयोग करना भी महत्वपूर्ण था। इस विषय पर न्यायिक, प्रशासनिक और सार्वजनिक स्तर पर अलग-अलग मत रहे हैं।

    अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की गिरावट और भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव
    अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये की गिरावट और भारत की अर्थव्यवस्था पर बढ़ता दबाव

    2014 से 2026 तक रुपये की यात्रा

    2014 में अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगभग 60 रुपये के आसपास था। अगले बारह वर्षों में वैश्विक आर्थिक परिस्थितियों, घरेलू नीतिगत कारकों,पूंजी प्रवाह, आयात लागत और डॉलर की मजबूती के कारण रुपये पर दबाव बना रहा। 2026 तक रुपया पहले की तुलना में काफी कमजोर स्तरों पर पहुँच चुका है।रुपये की कमजोरी का प्रभाव बहुआयामी होता है। कच्चा तेल, इलेक्ट्रॉनिक उपकरण, औद्योगिक मशीनरी और कई कच्चे माल महंगे हो जाते हैं। इससे उत्पादन लागत बढ़ती है और अंततः उपभोक्ता कीमतों पर असर पड़ता है। विदेश में पढ़ने वाले छात्रों, आयातकों और विदेशी मुद्रा ऋण रखने वाली कंपनियों पर भी अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।हालाँकि कमजोर रुपया निर्यातकों के लिए कुछ अवसर भी प्रदान कर सकता है, लेकिन यदि आयात पर निर्भरता अधिक हो, तो इसका शुद्ध प्रभाव महंगाई बढ़ाने वाला हो सकता है।

    भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा महंगाई नियंत्रण और ब्याज दरों पर नीति संबंधी निर्णय का प्रतीकात्मक दृश्य
    भारतीय रिजर्व बैंक द्वारा महंगाई नियंत्रण और ब्याज दरों पर नीति संबंधी निर्णय का प्रतीकात्मक दृश्य

    आरबीआई की भूमिका
    भारतीय रिजर्व बैंक का मुख्य दायित्व मूल्य स्थिरता बनाए रखना और वित्तीय प्रणाली में विश्वास सुनिश्चित करना है। रेपो रेट, नकदी प्रबंधन, विदेशी मुद्रा हस्तक्षेप और बैंकिंग विनियमन इसके प्रमुख उपकरण हैं।

    जब महंगाई बढ़ती है, तो आरबीआई सामान्यतः ब्याज दरें बढ़ाकर मांग को नियंत्रित करने का प्रयास करता है। लेकिन केवल मौद्रिक नीति से सभी समस्याओं का समाधान संभव नहीं होता। यदि महंगाई का कारण तेल कीमतें, खाद्य आपूर्ति या वैश्विक झटके हों, तो ब्याज दरों का प्रभाव सीमित हो सकता है।

    आरबीआई की नीतियों को लेकर समय-समय पर अलग-अलग दृष्टिकोण सामने आते रहे हैं। कुछ विशेषज्ञ इसे संतुलित और सावधान मानते हैं, जबकि कुछ का मत है कि वास्तविक जोखिमों का आकलन अधिक कठोर होना चाहिए।

    बजट और वित्तीय नीति
    केंद्रीय बजट केवल आय-व्यय का दस्तावेज नहीं, बल्कि सरकार की आर्थिक प्राथमिकताओं का दर्पण होता है। कर नीति, पूंजीगत व्यय, सामाजिक योजनाएं, सब्सिडी और घाटा प्रबंधन—सभी बजट के माध्यम से दिशा प्राप्त करते हैं।वर्तमान वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण के बजटों में बुनियादी ढाँचे,डिजिटलीकरण और पूंजीगत निवेश पर विशेष बल दिया गया है।

     

    इसके साथ-साथ प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, कर प्रशासन में सुधार और उत्पादन प्रोत्साहन योजनाएं भी प्रमुख रही हैं। दूसरी ओर, पूर्व वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के आर्थिक दृष्टिकोण को उदारीकरण, संस्थागत सुधार और वैश्विक एकीकरण के संदर्भ में याद किया जाता है।दो अलग-अलग काल खंडों की तुलना करते समय यह समझना आवश्यक है कि प्रत्येक दौर की घरेलू और वैश्विक परिस्थितियां भिन्न थीं। इसलिए तुलना का उद्देश्य श्रेष्ठता सिद्ध करना नहीं, बल्कि नीति दृष्टिकोणों को समझना होना चाहिए।

    तेल, उर्वरक और कृषि
    भारत कच्चे तेल के आयात पर काफी हद तक निर्भर है। जब अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल महंगा होता है, तो ईंधन, परिवहन और उत्पादन लागत बढ़ती है। इसी प्रकार उर्वरकों की वैश्विक आपूर्ति में बाधा आने पर कृषि लागत बढ़ सकती है।

    धान, मक्का और अन्य खरीफ फसलों की बुवाई के समय उर्वरकों की उपलब्धता अत्यंत महत्वपूर्ण होती है। यदि आपूर्ति बाधित हो जाए, तो उत्पादन प्रभावित हो सकता है और खाद्य कीमतों में वृद्धि हो सकती है। ऐसी स्थिति में सरकार को अतिरिक्त सब्सिडी देनी पड़ सकती है, जिससे राजकोषीय दबाव बढ़ता है।

    ब्याज दर और EMI
    यदि महंगाई अपेक्षा से अधिक रहती है, तो रेपो रेट में वृद्धि की संभावना बढ़ जाती है। ब्याज दरों में 25 या 50 बेसिस प्वाइंट की बढ़ोतरी भी गृह ऋण, वाहन ऋण और अन्य फ्लोटिंग रेट ऋणों की EMI को प्रभावित कर सकती है।मध्यवर्गीय परिवारों के लिए यह प्रभाव महत्वपूर्ण होता है क्योंकि उनकी आय का बड़ा हिस्सा पहले से ही आवास, शिक्षा, स्वास्थ्य और परिवहन पर खर्च होताहै। ब्याज दरों में वृद्धि बचत साधनों को आकर्षक बना सकती है, लेकिन उपभोग और निवेश की गति को धीमा भी कर सकती है।

    रोजगार और वास्तविक आय
    महंगाई का सबसे गंभीर प्रभाव तब दिखाई देता है जब वेतन वृद्धि कीमतों की वृद्धि के बराबर नहीं होती। इस स्थिति में नाममात्र आय बढ़ने के बावजूद वास्तविक आय घट जाती है। युवा वर्ग के लिए रोजगार की गुणवत्ता, वेतन स्तर और दीर्घकालिक अवसर अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।यदि अर्थव्यवस्था में उच्च विकास दर हो लेकिन गुणवत्तापूर्ण रोजगार पर्याप्त न बनें, तो आय असमानता बढ़ सकती है। यही कारण है कि महंगाई पर चर्चा को रोजगार और उत्पादकता से अलग करके नहीं देखा जा सकता।

    मध्यवर्ग और बचत

    भारतीय मध्यवर्ग लंबे समय से शिक्षा, स्वास्थ्य, आवास और भविष्य की सुरक्षा के लिए बचत पर निर्भर रहा है। किंतु जब कीमतें लगातार बढ़ती हैं, तब परिवारों को अपनी बचत का उपयोग नियमित खर्चों के लिए करना पड़ सकता है।कम ब्याज दरों, अस्थिर बाजारों और ऊँची जीवन-यापन लागत के बीच वित्तीय योजना बनाना कठिन हो जाता है। इसलिए महंगाई नियंत्रण केवल गरीबों का नहीं, बल्कि मध्यवर्ग की आर्थिक स्थिरता का भी प्रश्न है।

    भारत की वैश्विक स्थिति
    भारत आज विश्व की प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है और डिजिटल भुगतान, अवसंरचना तथा उद्यमिता के क्षेत्र में उल्लेखनीय प्रगति हुई है। फिर भी विनिर्माण क्षमता, प्रति व्यक्ति आय, शिक्षा गुणवत्ता, अनुसंधान निवेश और निर्यात प्रतिस्पर्धा जैसे क्षेत्रों में सुधार की व्यापक संभावनाएं मौजूद हैं।चीन, वियतनाम और अन्य एशियाई देशों ने विनिर्माण और निर्यात आधारितरण नीतियों के माध्यम से तेज प्रगति की। भारत के पास विशाल घरेलू बाजार, युवा आबादी और तकनीकी क्षमता जैसी मजबूत विशेषताएँ हैं। चुनौती यह है कि इन शक्तियों को स्थायी रोजगार, उत्पादक उद्योग और संतुलित क्षेत्रीय विकास में कैसे बदला जाए।

    2014 से 2026: उपलब्धियाँ और चुनौतियां
    इस अवधि में भारत ने डिजिटल भुगतान, सड़क और रेल अवसंरचना, प्रत्यक्ष लाभ अंतरण, स्टार्टअप पारिस्थितिकी और कर सुधार जैसे क्षेत्रों में महत्वपूर्ण प्रगतिकी। दूसरी ओर बेरोजगारी, कृषि आय, महंगाई, आय असमानता और रुपये की कमजोरी जैसे मुद्दे लगातार चर्चा में रहे।किसी भी आर्थिक कालखंड का निष्पक्ष मूल्यांकन उपलब्धियों और चुनौतियों दोनों को साथ रखकर ही किया जा सकता है। यही दृष्टिकोण लोकतांत्रिक विमर्श को अधिक उपयोगी बनाता है।

    आम नागरिक के लिए अर्थ
    यदि महंगाई अपेक्षा से अधिक रहती है, तो आम लोगों को भोजन, परिवहन, शिक्षा, स्वास्थ्य और ऋण भुगतान पर अतिरिक्त दबाव महसूस हो सकता है। छोटे व्यापारियों के लिए कार्यशील पूंजी महंगी हो सकती है। किसानों के लिए इनपुट लागत बढ़ सकती है। नौकरीपेशा वर्ग की बचत घट सकती है।

    दूसरी ओर यदि नीतियाँ समय पर और संतुलित हों, तो महंगाई को नियंत्रित किया जा सकता है और विकास को अधिक समावेशी बनाया जा सकता है।

    ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की चेतावनी भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत है। यह बताती है कि वैश्विक तेल कीमतें, कमजोर रुपया, कृषि लागत, उर्वरक आपूर्ति और घरेलू आर्थिक संरचना मिलकर महंगाई को प्रभावित कर सकती हैं। साथ ही यह भी स्पष्ट करती है कि आर्थिक प्रश्न केवल सांख्यिकीय बहस नहीं, बल्कि करोड़ों परिवारों के जीवन की वास्तविकता हैं।

     

    80 करोड़ लोगों को खाद्य सुरक्षा, रुपये की गिरावट, बजट नीतियाँ,आरबीआई के निर्णय, पीएम केयर्स पर पारदर्शिता संबंधी बहस और रोजगार की चुनौतियाँ—येसभी मिलकर भारत की समकालीन आर्थिक कहानी बनाते हैं। इस कहानी में उपलब्धियाँ भी हैं,प्रश्न भी हैं, और भविष्य की संभावनाएं भी।

     

    भारत के सामने सबसे बड़ा अवसर यह है कि वह विकास, रोजगार, मूल्य स्थिरता और सामाजिक सुरक्षा के बीच संतुलन स्थापित करे। यदि नीति निर्माण में पारदर्शिता, संस्थागत मजबूती और दीर्घकालिक दृष्टि बनी रहती है, तो महंगाई जैसी चुनौतियों के बावजूद भारत अपनी आर्थिक क्षमता को व्यापक जनकल्याण में बदल सकता है।

    लेखक वरिष्ठ पत्रकार, चिंतक, राजनीतिक विचारक है।
    Email : atalhind@gmail.com,  Mo: 9416111503
    Add: 401A/10 NEW Ashoka Colony SBI Road Kaithal 136027 Haryana
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