राजीव कुमार: चुनाव आयोग से एचडीएफसी (HDFC) बैंक तक – संस्थागत विश्वास पर उठते सवाल
नई दिल्ली/29 जून 2026 /राजकुमार अग्रवाल
पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार (1984 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा अधिकारी) को एचडीएफसी बैंक का अंशकालिक अध्यक्ष (पार्ट-टाइम चेयरमैन) बनाए जाने की खबर सामान्य प्रशासनिक नियुक्ति नहीं है।
यह एक ऐसे अधिकारी की नियुक्ति है, जिनके कार्यकाल में भारत के सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक संस्थान – चुनाव आयोग – पर पक्षपात और विश्वसनीयता के गंभीर सवाल खड़े हुए।
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राजीव कुमार ने मई 2022 से फरवरी 2025 तक मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) का पद संभाला। इस दौरान 2024 के लोकसभा चुनाव समेत कई राज्यों के चुनाव हुए। चुनाव आयोग (ECI) का आधिकारिक दावा है कि चुनाव शांतिपूर्ण रहे और सुधार हुए, लेकिन विपक्षी दलों और स्वतंत्र नजर रखने वालों ने जो तथ्य पेश किए, वे चिंताजनक हैं।
तथ्य और विवाद
- विपक्ष ने बार-बार मतदाता सूची में हेरफेर का आरोप लगाया। तृणमूल कांग्रेस (TMC) ने पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त राजीव कुमार के खिलाफ प्राथमिकी (FIR) दर्ज करने की मांग की।
- 2024 के लोकसभा चुनाव में मतदान के दिन वास्तविक समय के मतदान के आंकड़ों (real-time turnout data) और अंतिम आंकड़ों में अंतर पर कांग्रेस समेत कई दलों ने सवाल उठाए। चुनाव आयोग पर पारदर्शिता न रखने का आरोप लगा।
- असम में चुनाव क्षेत्रों के पुनर्गठन (delimitation exercise) को भारतीय जनता पार्टी (BJP) के पक्ष में धांधली (gerrymandering) बताया गया।
- सूरत संसदीय सीट पर बिना किसी मुकाबले के भाजपा उम्मीदवार का चुनाव जीतना भी विवादों में रहा।
- चुनाव आयुक्त अरुण गोयल का अचानक इस्तीफा (2024) – इसमें आंतरिक मतभेदों की खबरें आईं।
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राजीव कुमार जैसे लोगो को संवैधानिक पदों के बाद ‘कूलिंग ऑफ पीरियड’ की जरूरत क्यों है?,राजीव कुमार के कार्यकाल पर उठे सवाल और HDFC बैंक की नियुक्ति,-फोटो अटल हिन्द से साभार
स्वतंत्र राजनीतिक विश्लेषक योगेंद्र यादव ने इंडियन एक्सप्रेस में लिखा कि राजीव कुमार के कार्यकाल में चुनाव आयोग की लोकप्रियता में भारी गिरावट आई (लोकनीति-सीएसडीएस सर्वे के हवाले से)। कपिल सिब्बल जैसे वरिष्ठ वकीलों ने भी आयोग को “पक्षपाती” (biased) करार दिया।
चुनाव आयोग ने इन आरोपों को गलत बताया और कहा कि झूठी खबरें फैलाई जा रही हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने कई याचिकाओं में चुनाव आयोग को राहत दी, लेकिन नियुक्ति की प्रक्रिया (2023 के कानून) पर सवाल अभी भी बने हुए हैं।
एचडीएफसी (HDFC) बैंक में नियुक्ति का सवाल
राजीव कुमार पूर्व वित्त सचिव (फाइनेंस सेक्रेटरी) भी रह चुके हैं। बैंकिंग सुधारों में उनका अनुभव सराहनीय है, लेकिन सवाल यह है – क्या चुनाव आयुक्त के रूप में विवादों में रहने के बाद, वे देश के सबसे बड़े निजी बैंक एचडीएफसी के अध्यक्ष पद के लिए पूरी तरह उपयुक्त हैं?
एचडीएफसी बैंक में करोड़ों जमाकर्ताओं का पैसा लगा है। जब चुनाव आयोग पर “वोट चोरी” जैसे गंभीर आरोप लगे हों, तो उसी व्यक्ति का बैंकिंग क्षेत्र में जाना संस्थागत नैतिकता (संस्थानों के नैतिक मूल्यों) पर सवाल उठाता है।
क्या भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) को इस नियुक्ति की और गहराई से जांच करनी चाहिए? क्या पूर्व संवैधानिक पदों पर रहने वालों के लिए निजी क्षेत्र (प्राइवेट सेक्टर) में जाने के लिए कम से कम 2-3 साल का ‘कूलिंग ऑफ पीरियड’ (पद छोड़ने के बाद का अनिवार्य विश्राम काल) तय किया जाना चाहिए?
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जनता के लिए चिंता का विषय
आज आम नागरिक दोहरी चिंता में है – न वोट का भरोसा, न बैंक खाते का। जब चुनाव आयोग जैसी संस्था पर सवाल उठते हैं, तो लोकतंत्र कमजोर होता है। जब पूर्व मुख्य चुनाव आयुक्त किसी बड़े निजी बैंक की कमान संभालते हैं, तो शासन (गवर्नेंस) और हितों के टकराव (conflict of interest) का खतरा बढ़ जाता है।
राजीव कुमार का करियर सराहनीय रहा है, लेकिन उनके मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यकाल में उठे सवालों को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। एचडीएफसी बैंक जैसी संस्था में उनकी नियुक्ति न सिर्फ बैंकिंग क्षेत्र, बल्कि पूरे शासन तंत्र की पारदर्शिता और विश्वसनीयता की परीक्षा है।
देश की जनता को अब चौकस रहना होगा। वोट की तरह अपनी जमा पूंजी की भी सुरक्षा करनी होगी। संस्थाएं तभी मजबूत होती हैं, जब उनमें जनता का अटूट विश्वास हो। फिलहाल, राजीव कुमार की यह नियुक्ति उस विश्वास को और मजबूत करने या कमजोर करने की दिशा तय करेगी।


