विशेष व्यापारिक पड़ताल: ‘इंपोर्टेड फ़ूड’ के नाम पर ‘धीमा ज़हर’ बेचने वाला गिरोह और भारत-अमेरिकी फूड सेफ्टी के बीच का बड़ा ‘ग्रे मार्केट’
नई दिल्ली / 14 जुलाई 2026 / जनता आवाज़ / विशेष रिपोर्ट – राजकुमार अग्रवाल
भारतीय मिडिल क्लास की बढ़ती जेब, विदेशी ब्रांड्स के प्रति बढ़ता क्रेज और ‘स्टेटस सिंबल’ की चाहत ने मिलकर भारत में एक नए और चमचमाते बाजार को जन्म दिया है—इंपोर्टेड फूड मार्केट (Imported Premium Food Market)। लेकिन इस चमक-दमक के पीछे एक ऐसा काला खेल चल रहा है, जो न सिर्फ भारतीय ग्राहकों की जेब पर डाका डाल रहा है, बल्कि उनके और उनके बच्चों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ भी कर रहा है।
हाल ही में दिल्ली क्राइम ब्रांच द्वारा 54 साल के अटल जायसवाल और उनके 6 दोस्तों के सिंडिकेट का भंडाफोड़ इस बात का सबसे बड़ा सबूत है। इस गिरोह ने अमेरिका और दुबई से एक्सपायर्ड या बिल्कुल एक्सपायरी के करीब पहुंच चुके प्रीमियम फूड प्रोडक्ट्स को बेहद कम दामों पर भारत मंगाया, दिल्ली में एक अवैध फैक्ट्री में केमिकल से पुरानी डेट्स मिटाईं, फर्जी नए बारकोड और MRP स्टिकर लगाए, और उन्हें Amazon जैसे नामी ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स पर “फ्रेश प्रीमियम इंपोर्टेड फूड” बनाकर बेच डाला।मामला 24 दिसंबर 2025 का है जब मास्टरमाइंड राणा प्रताप बाग निवासी अटल जायसवाल (54), मालवीय नगर के विश्वजीत धारा (25), झारखंड के शिव कुमार (40), बिहार के विनोद (43) अरुण कुमार (30), यूपी जौनपुर के विजय कांत (50), एटा के शमीम (30) को गिरफ्तार किया गया है।
इस गिरोह ने सिर्फ कुछ समय में ₹6 से ₹10 करोड़ की काली कमाई की। क्राइम ब्रांच की रेड में जब 6,000 किलो चॉकलेट और बिस्कुट, 14,000 लीटर कोल्ड ड्रिंक्स और हजारों किलो सॉस, मेयोनेज़ व मिल्क पाउडर बरामद हुआ, तो देश के फूड सेफ्टी सिस्टम की कलई खुलकर सामने आ गई।
इस विशेष व्यापारिक लेख में हम अमेरिकी मीडिया, अमेरिकी निर्यात बाजार के आंकड़ों, भारतीय कस्टम्स की खामियों और ऑनलाइन ई-कॉमर्स की इस ‘काली हकीकत’ का पूरा पोस्टमार्टम करेंगे।

अमेरिका का ‘फूड वेस्टेज’ और भारत का ‘फर्जी इंपोर्ट’ कनेक्शन
इस पूरे घोटाले की जड़ें अमेरिका के रिटेल बाजार और वहां के फूड रेगुलेशन से जुड़ी हैं। अमेरिकी मीडिया और वहां के व्यापारिक संगठनों (जैसे USDA – United States Department of Agriculture) की रिपोर्ट्स के अनुसार, अमेरिका में हर साल अरबों डॉलर का खाना बर्बाद होता है या एक्सपायरी के करीब होने के कारण कौड़ियों के भाव बेच दिया जाता है।
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अमेरिकी बाजार का ‘लिक्विडेशन’ मॉडल (Liquidation Market)
अमेरिका में एक बहुत बड़ा और कानूनी लिक्विडेशन मार्केट (Liquidation & Closeout Market) है। जब किसी वॉलमार्ट (Walmart), टारगेट (Target) या कोस्टको (Costco) जैसे बड़े सुपरमार्केट में ओरियो बिस्कुट, कोका-कोला या प्रीमियम चॉकलेट्स की एक्सपायरी डेट में केवल 1 से 2 महीने का समय बचता है, तो वे इन्हें अपनी मुख्य शेल्फ से हटा देते हैं।
कौड़ियों के भाव बिक्री: ये सुपरमार्केट्स इन प्रोडक्ट्स को अपनी कुल लागत के 5% से 10% दाम पर लिक्विडेटर्स (कबाड़ खरीदारों) को बेच देते हैं।
ग्रे मार्केट का खेल: भारत के अटल जायसवाल जैसे जालसाज इन अमेरिकी लिक्विडेटर्स के सीधे संपर्क में रहते हैं। जो ओरियो का पैक अमेरिका में $4 (लगभग ₹330) का बिकता है, उसे ये जालसाज एक्सपायरी के करीब होने पर महज $0.20 से $0.40 (यानी ₹15 से ₹30) में खरीद लेते हैं।
दुबई का ‘ट्रांजिट हब’ के रूप में इस्तेमाल: अमेरिकी कस्टम और कड़े कानूनों से सीधे बचने के लिए, कई बार इन शिपमेंट्स को पहले दुबई भेजा जाता है। दुबई को दुनिया का सबसे बड़ा री-एक्सपोर्ट हब माना जाता है। वहां से कागजात बदलकर (Paperwork Manipulation) इन्हें भारत के पोर्ट्स पर भेजा जाता है।
भारतीय कस्टम्स और पोर्ट्स की सुस्ती: कैसे पास हो जाता है ‘ज़हर’?
एक बड़ा सवाल यह उठता है कि जब भारत में फूड सेफ्टी एंड स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी ऑफ इंडिया (FSSAI) और कस्टम्स विभाग जैसे कड़े सुरक्षा घेरे हैं, तो हजारों टन एक्सपायर्ड फूड भारत की सीमा में घुस कैसे जाता है?
इसके पीछे तीन मुख्य रास्ते और खामियां हैं:
| तरीका | खेल का तरीका (Modus Operandi) | FSSAI की गाइडलाइन की धज्जियां |
| मिसडिक्लेरेशन (Misdeclaration) | कागजों पर माल को ‘कन्फेक्शनरी’ या ‘रॉ मटेरियल’ दिखाया जाता है, न कि तैयार खाने-पीने का सामान। | FSSAI का नियम है कि भारत आने वाले किसी भी इंपोर्टेड फूड की शेल्फ लाइफ कम से कम 60% बची होनी चाहिए। लेकिन मिसडिक्लेरेशन के कारण यह जांच से बच जाता है। |
| ग्रीन चैनल का दुरुपयोग | कई जाने-माने इंपोर्टर्स के नाम पर फर्जी कंपनियां (Shell Companies) बनाई जाती हैं, जिन्हें कस्टम्स में “ग्रीन चैनल” (बिना फिजिकल वेरिफिकेशन के पास होना) की सुविधा मिली होती है। | बिना किसी फिजिकल वेरिफिकेशन के कंटेनर सीधे दिल्ली-एनसीआर के गोदामों में पहुंच जाते हैं। |
| छोटे पोर्ट्स और लैंड बॉर्डर्स | मुंबई या मुंद्रा जैसे बड़े और हाई-टेक पोर्ट्स के बजाय, कई बार इन कंसाइनमेंट्स को ऐसे छोटे पोर्ट्स या ड्राई पोर्ट्स (ICD) के जरिए लाया जाता है जहां फूड टेस्टिंग की उचित व्यवस्था नहीं होती। | लोकल स्तर पर सेटिंग और ढीली निगरानी का फायदा उठाकर माल को क्लियर करा लिया जाता है। |
केमिकल से खेल और री-पैकेजिंग की डरावनी दास्तान
दिल्ली की अवैध फैक्ट्री में जो खेल चल रहा था, वह किसी साइंस-फिक्शन हॉरर फिल्म से कम नहीं है। पुलिस की रेड में यह सामने आया कि इस गिरोह ने बकायदा एक ‘री-ब्रांडिंग असेंबली लाइन’ तैयार कर रखी थी।
| चरण (Step) | मुख्य प्रक्रिया (Process) | इसके पीछे का काला खेल (Inside Details) |
| चरण 1 | कंटेनर में आयात | अमेरिका और दुबई से बेहद कम दाम में एक्सपायर्ड या एक्सपायरी के करीब आ चुके सामान को भारत लाया जाता है। |
| चरण 2 | असली डेट मिटाना | विशेष केमिकल जैसे थिनर (Thinner) या एसीटोन (Acetone) का इस्तेमाल कर पैकेट पर छपी असली एक्सपायरी डेट को साफ कर दिया जाता है। |
| चरण 3 | नई डेट प्रिंट करना | अवैध रूप से लगाई गई हाई-स्पीड कोडिंग मशीन की मदद से पैकेट पर नई और मनगढ़ंत भविष्य की एक्सपायरी डेट प्रिंट कर दी जाती है। |
| चरण 4 | फर्जी लेबलिंग | ग्राहकों और जांच एजेंसियों को धोखा देने के लिए पैकेट पर नया बारकोड और FSSAI का फर्जी नंबर वाला चमचमाता स्टिकर चिपकाया जाता है। |
| चरण 5 | वेयरहाउस डिलीवरी | इस नकली ‘प्रीमियम इंपोर्टेड’ सामान को सुरक्षित दिखाने के लिए सीधे ई-कॉमर्स (जैसे Amazon) के वेयरहाउस भेजकर लिस्ट कर दिया जाता है। |
केमिकल का इस्तेमाल और स्वास्थ्य पर असर:
एसीटोन और थिनर: प्लास्टिक की बोतलों (जैसे कोका-कोला) और एल्युमिनियम फॉयल (चॉकलेट रैपर्स) से प्रिंट हटाने के लिए एसीटोन, आइसोप्रोपिल अल्कोहल या औद्योगिक थिनर का इस्तेमाल किया जाता है। ये केमिकल पैकेजिंग के जरिए खाने के अंदर तक रिस जाते हैं।
फर्जी FSSAI नंबर: भारतीय कानून के मुताबिक हर इंपोर्टेड सामान पर भारत के आयातक (Importer) का FSSAI लाइसेंस नंबर होना अनिवार्य है। इस गिरोह ने कुछ पुरानी, बंद हो चुकी कंपनियों या पूरी तरह फर्जी FSSAI नंबरों के स्टिकर छपवा रखे थे, जिन्हें कोई आम ग्राहक कभी वेरीफाई नहीं करता।
ग्रे मार्केट एनालिसिस: अमेरिका का लिक्विडेटेड फूड और भारतीय ई-कॉमर्स पर फर्जीवाड़े का ₹10 करोड़ का सिंडिकेट
ऑनलाइन ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स का ‘डार्क साइड’ (Dark Side of E-Commerce)
अटल जायसवाल के इस सिंडिकेट ने अपने माल को बेचने के लिए किसी गली-नुक्कड़ की दुकान को नहीं चुना। उन्होंने देश के सबसे बड़े ऑनलाइन मार्केटप्लेस Amazon और Flipkart जैसी साइटों का सहारा लिया। क्यों? क्योंकि वहां ग्राहक का भरोसा पहले से बना हुआ है।
ई-कॉमर्स की इस खामी का फायदा उठाया गया:
ओपन मार्केटप्लेस मॉडल: Amazon या अन्य ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स खुद हर सामान नहीं बेचते। वे ‘थर्ड-पार्टी सेलर्स’ (Third-Party Sellers) को मंच देते हैं। कोई भी व्यक्ति जीएसटी (GST) नंबर और FSSAI रजिस्ट्रेशन दिखाकर सेलर बन सकता है।
‘फुलफिल्ड बाय’ (Fulfilled by) का झांसा: ये ठग अपना माल सीधे ई-कॉमर्स कंपनियों के बड़े वेयरहाउस (Fulfillment Centers) में भेज देते थे। वेयरहाउस में केवल फिजिकल डैमेज चेक किया जाता है, यह नहीं कि अंदर की चॉकलेट एक्सपायर्ड है या केमिकल से साफ की गई है।
‘प्रीमियम’ टैग की आड़: जब ग्राहक देखता है कि कोई विदेशी ओरियो या खास कोका-कोला फ्लेवर सामान्य से थोड़े डिस्काउंट पर ऑनलाइन मिल रहा है, तो वह बिना सोचे-समझे ऑर्डर कर देता है।
मार्केट का गणित: जो एक्सपायर्ड चॉकलेट इन्हें अमेरिका से ₹10-15 में मिली, उसे केमिकल से चमकाकर अमेज़न पर “प्रीमियम यूएसए इंपोर्टेड” लिखकर ₹350 से ₹500 में बेचा गया। मुनाफा सीधे 1500% से 2000% तक!
क्या एजेंसियां सो रही थीं? फूड सेफ्टी इकोसिस्टम पर बड़े सवाल
इस पूरे मामले ने भारत के खाद्य सुरक्षा तंत्र की पोल खोल कर रख दी है। FSSAI और स्थानीय स्वास्थ्य विभागों की निष्क्रियता पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं:
मार्केट सर्विलांस का अभाव: FSSAI का काम केवल बॉर्डर पर जांच करना नहीं, बल्कि समय-समय पर बाजार और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स से रैंडम सैंपल उठाना भी है। यह गिरोह महीनों से करोड़ों का माल बेच रहा था, लेकिन किसी भी एजेंसी ने रैंडम सैंपलिंग नहीं की।
ऑनलाइन सेलर्स का वेरिफिकेशन बेहद ढीला: ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स पर सेलर बनने के लिए डॉक्युमेंटेशन तो कड़ा है, लेकिन उन डॉक्युमेंट्स की फिजिकल वेरिफिकेशन या समय-समय पर गोदामों की औचक जांच (Surprise Inspection) का सिस्टम पूरी तरह फेल है।
उपभोक्ता जागरूकता का शून्य स्तर: भारतीय उपभोक्ता आज भी इंपोर्टेड का मतलब ‘बेहतर और सुरक्षित’ मान लेता है। वे यह नहीं जानते कि असली और नकली इंपोर्टेड लेबल में अंतर कैसे करें।
अमेरिकी और वैश्विक मीडिया की नजर: भारत की छवि को धक्का
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (USTR) और अमेरिकी मीडिया लगातार भारत में इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स (IPR) और फूड सेफ्टी के मुद्दों पर रिपोर्ट जारी करते रहते हैं।
ब्रांड वैल्यू को नुकसान: कोका-कोला और ओरियो (Mondelez) जैसे बड़े अमेरिकी ब्रांड्स के लिए यह एक बड़ा झटका है। जब भारतीय ग्राहक इन नकली या एक्सपायर्ड प्रोडक्ट्स को खाकर बीमार पड़ेंगे, तो बदनाम अमेरिकी ब्रांड्स होंगे, न कि वो जाली सेलर।
व्यापारिक प्रतिबंधों का खतरा: इस तरह के घोटालों के बाद अमेरिकी और यूरोपीय देश भारत से होने वाले फूड एक्सपोर्ट्स पर और कड़े नियम थोप सकते हैं, जिससे देश के ईमानदार निर्यातकों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है।
नकली और एक्सपायर्ड इंपोर्टेड फूड को पहचानने के 5 तरीके
इस खतरनाक खेल से बचने के लिए ग्राहकों को खुद ही सावधान होना पड़ेगा। अगली बार जब आप कोई विदेशी चॉकलेट, सॉस या ड्रिंक खरीदें, तो इन बातों का विशेष ध्यान रखें:
स्टिकर की जांच करें: असली इंपोर्टेड फूड पर FSSAI का स्टिकर साफ, अच्छी क्वालिटी के कागज पर होता है और उस पर आयातक (Importer) का पूरा नाम, पता और वैध लाइसेंस नंबर दर्ज होता है। अगर स्टिकर पर छपाई धुंधली है या वह आसानी से उखड़ रहा है, तो सावधान हो जाएं।
स्मज टेस्ट (Smudge Test): पैकिंग पर जहां एक्सपायरी डेट लिखी है, वहां अपनी उंगली पर थोड़ा सा थिनर, सैनिटाइजर या थूक लगाकर रगड़ें। अगर काली स्याही आसानी से फैल जाती है या मिट जाती है, तो समझ लें कि इसे री-प्रिंट किया गया है।
बारकोड स्कैनर का इस्तेमाल: अपने स्मार्टफोन से बारकोड को स्कैन करें। असली प्रोडक्ट का बारकोड आपको सीधे उस ब्रांड की ग्लोबल वेबसाइट या प्रोडक्ट की सही जानकारी पर ले जाएगा।
असामान्य रूप से भारी डिस्काउंट: यदि कोई प्रीमियम इंपोर्टेड चॉकलेट या ड्रिंक बाजार मूल्य से आधा या उससे भी कम दाम पर ऑनलाइन मिल रही है, तो लालच में न आएं। दाल में कुछ काला जरूर है।
स्वाद और महक में बदलाव: यदि पैकेट खोलने पर अजीब सी महक आए, या चॉकलेट का रंग सफेद/धुंधला (Fat Bloom) दिख रहा हो, तो उसे तुरंत फेंक दें और प्लेटफॉर्म पर उसकी शिकायत दर्ज करें।
अब कड़े कदमों की जरूरत
अटल जायसवाल और उसके गैंग की गिरफ्तारी महज एक ‘टिप ऑफ द आइसबर्ग’ (बर्फबारी का सिरा मात्र) है। भारत का ‘ग्रे और काउंटरफ्रीट’ (फर्जी) मार्केट साइज लगातार बढ़ रहा है।
जब तक FSSAI ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म्स के लिए कठोर ‘सेलर लायबिलिटी’ (विक्रेता जिम्मेदारी) कानून नहीं लाता, कस्टम्स विभाग बॉर्डर पर 100% स्कैनिंग और टेस्टिंग की व्यवस्था नहीं करता, और फर्जीवाड़ा करने वालों को कड़ी गैर-जमानती सजा का प्रावधान नहीं होता, तब तक भारतीय उपभोक्ताओं की थाली में ‘इंपोर्टेड’ के नाम पर यह धीमा जहर परोसा जाता रहेगा।
अब समय आ गया है कि सरकार इस नींद से जागे और भारतीय नागरिकों के स्वास्थ्य की सुरक्षा को मुनाफे की इस अंधी दौड़ से ऊपर रखे।


