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    Home » कार पर सस्ता, शिक्षा पर ब्याज भारी क्यों?

    कार पर सस्ता, शिक्षा पर ब्याज भारी क्यों?

    Janta AwaazBy Janta AwaazMay 19, 202618 Views
    शिक्षा ऋण पर आधारित सामान्य समाचार चित्र, जिसमें बैंक भवन की पृष्ठभूमि में पुस्तकों का ढेर, ग्रेजुएशन कैप, रुपये के चिन्ह वाला धन बैग, कैलकुलेटर, सिक्के और “Loan” बोर्ड दिखाई दे रहे हैं। यह चित्र बढ़ती शिक्षा फीस, ऊँची ब्याज दरों और मध्यमवर्गीय परिवारों पर शिक्षा ऋण के बढ़ते आर्थिक बोझ को दर्शाता है।
    शिक्षा ऋण पर आधारित सामान्य समाचार चित्र, जिसमें बैंक भवन की पृष्ठभूमि में पुस्तकों का ढेर, ग्रेजुएशन कैप, रुपये के चिन्ह वाला धन बैग, कैलकुलेटर, सिक्के और “Loan” बोर्ड दिखाई दे रहे हैं। यह चित्र बढ़ती शिक्षा फीस, ऊँची ब्याज दरों और मध्यमवर्गीय परिवारों पर शिक्षा ऋण के बढ़ते आर्थिक बोझ को दर्शाता है।

    उच्च शिक्षा का बढ़ता आर्थिक बोझ

    मेडिकल, इंजीनियरिंग, प्रबंधन, विधि, निजी विश्वविद्यालयों तथा विदेशों में शिक्षा—इन सभी क्षेत्रों में फीस लाखों रुपये तक पहुँच चुकी है। मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए वर्षों की बचत खर्च करते हैं, गहने बेचते हैं, भविष्य निधि तोड़ते हैं और फिर भी शिक्षा ऋण लेने को विवश हो जाते हैं।

    दुखद तथ्य यह है कि जिस शिक्षा से युवा का भविष्य निर्मित होना है, उसी पर सबसे अधिक ब्याज का भार डाल दिया जाता है। कई बार कार लोन की ब्याज दरें शिक्षा ऋण से कम होती हैं। अर्थात एक उपभोक्ता वस्तु खरीदना ज्ञान अर्जित करने से सस्ता पड़ता है।

    डॉ. प्रियंका सौरभपीएचडी (राजनीति विज्ञान) कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार उब्बा भवन, आर्यनगर हिसार (हरियाणा)
    डॉ. प्रियंका सौरभ
    पीएचडी (राजनीति विज्ञान)
    कवयित्री | सामाजिक चिंतक | स्तंभकार
    उब्बा भवन, आर्यनगर
    हिसार (हरियाणा)
    भारत जैसे विकासशील देश में शिक्षा को हमेशा राष्ट्र निर्माण का सबसे बड़ा माध्यम माना गया है। हम अक्सर यह कहते हैं कि युवा देश का भविष्य हैं, शिक्षा समाज की रीढ़ है और ज्ञान ही विकास का आधार है। लेकिन जब व्यवहारिक व्यवस्था को देखा जाता है, तो तस्वीर कुछ और दिखाई देती है।
    विडंबना यह है कि आज भारत में कार खरीदना आसान होता जा रहा है, लेकिन उच्च शिक्षा प्राप्त करना लगातार कठिन और महँगा होता जा रहा है। बैंक आपको नई कार खरीदने के लिए आकर्षक ब्याज दरों पर तुरंत ऋण देने को तैयार मिल जाएंगे, परंतु वही बैंक जब किसी विद्यार्थी को शिक्षा ऋण देते हैं, तो ब्याज दरें बढ़ जाती हैं, नियम कठोर हो जाते हैं और भविष्य को जोखिम मान लिया जाता है। यह स्थिति केवल बैंकिंग प्रणाली की तकनीकी समस्या नहीं है, बल्कि हमारी सामाजिक और आर्थिक प्राथमिकताओं पर गंभीर प्रश्नचिह्न भी है।
    आज भारत में उच्च शिक्षा का खर्च सामान्य परिवारों की सामर्थ्य से तेजी से बाहर होता जा रहा है। मेडिकल, इंजीनियरिंग, मैनेजमेंट, लॉ, निजी विश्वविद्यालयों की पढ़ाई या विदेश में शिक्षा—हर क्षेत्र में फीस लाखों में पहुँच चुकी है। मध्यमवर्गीय परिवार अपने बच्चों की पढ़ाई के लिए वर्षों की बचत लगा देते हैं, गहने बेचते हैं, भविष्य निधि तोड़ते हैं, फिर भी शिक्षा ऋण लेने की आवश्यकता पड़ती है।
    लेकिन दुखद स्थिति यह है कि जिस शिक्षा से एक युवा का भविष्य बनना है, उसी पर सबसे अधिक ब्याज का बोझ लाद दिया जाता है। कार लोन की ब्याज दरें कई बार शिक्षा ऋण से कम होती हैं। अर्थात एक उपभोक्ता वस्तु खरीदना शिक्षा प्राप्त करने से सस्ता पड़ता है। यह केवल आर्थिक असंतुलन नहीं, बल्कि सामाजिक सोच की भी त्रासदी है।
    जंतरआवाज़ डॉट कॉम के लिए शिक्षा ऋण पर समाचार ग्राफिक, जिसमें बैंक भवन की पृष्ठभूमि में पुस्तकों का ढेर, ग्रेजुएशन कैप, रुपये का प्रतीक वाला धन बैग, सिक्के और “Education Loan” लिखा हुआ दिखाया गया है। चित्र में बढ़ती फीस, उच्च ब्याज दर और शिक्षा ऋण को सीधे वित्तीय विषय के रूप में दर्शाया गया है।
    जंतरआवाज़ डॉट कॉम के लिए शिक्षा ऋण पर समाचार ग्राफिक, जिसमें बैंक भवन की पृष्ठभूमि में पुस्तकों का ढेर, ग्रेजुएशन कैप, रुपये का प्रतीक वाला धन बैग, सिक्के और “Education Loan” लिखा हुआ दिखाया गया है। चित्र में बढ़ती फीस, उच्च ब्याज दर और शिक्षा ऋण को सीधे वित्तीय विषय के रूप में दर्शाया गया है।
    बैंकिंग व्यवस्था का तर्क यह होता है कि कार लोन सुरक्षित होता है क्योंकि वाहन बैंक के लिए गिरवी संपत्ति का काम करता है। यदि ऋण लेने वाला व्यक्ति भुगतान न करे, तो कार जब्त की जा सकती है। लेकिन शिक्षा ऋण में बैंक के पास कोई भौतिक संपत्ति नहीं होती। वहाँ केवल छात्र की योग्यता, उसकी डिग्री और उसका भविष्य होता है।
    इसलिए बैंक इसे जोखिमपूर्ण निवेश मानते हैं। यह तर्क बैंकिंग दृष्टि से भले सही प्रतीत हो, लेकिन राष्ट्रीय दृष्टि से अत्यंत संकीर्ण है। किसी भी राष्ट्र के लिए सबसे बड़ा निवेश उसकी युवा पीढ़ी होती है। एक छात्र जब डॉक्टर, इंजीनियर, वैज्ञानिक, शिक्षक, शोधकर्ता या प्रशासक बनता है, तो उसका लाभ केवल व्यक्तिगत नहीं होता, पूरा समाज उससे लाभान्वित होता है। ऐसे में शिक्षा ऋण को केवल व्यापारिक उत्पाद की तरह देखना दूरदर्शिता नहीं कहलाएगा।
    वर्तमान समय में शिक्षा ऋण केवल आर्थिक सहायता नहीं, बल्कि मानसिक दबाव का कारण भी बनता जा रहा है। लाखों विद्यार्थी पढ़ाई पूरी होने से पहले ही ईएमआई और ब्याज की चिंता में घिर जाते हैं। नौकरी मिलने से पहले ही कर्ज का भय उन्हें परेशान करने लगता है। कई छात्र अपनी रुचि और प्रतिभा के अनुसार करियर चुनने के बजाय केवल अधिक वेतन वाली नौकरियों की ओर इसलिए भागते हैं ताकि ऋण चुका सकें। परिणामस्वरूप शोध, अध्यापन, साहित्य, सामाजिक सेवा और कला जैसे क्षेत्रों में प्रतिभाशाली युवाओं की संख्या घटती जा रही है। समाज धीरे-धीरे केवल वेतन आधारित सफलता का समर्थक बनता जा रहा है।
    इस समस्या का सबसे अधिक प्रभाव भारतीय मध्यमवर्ग पर पड़ता है। आर्थिक रूप से संपन्न परिवार महँगी शिक्षा का खर्च आसानी से उठा लेते हैं। गरीब वर्ग के लिए सरकार की कुछ योजनाएँ और छात्रवृत्तियाँ उपलब्ध होती हैं। लेकिन सबसे अधिक संघर्ष उस वर्ग को करना पड़ता है जो “गरीब” की श्रेणी में नहीं आता, फिर भी लाखों रुपये की फीस वहन करने में सक्षम नहीं होता। ऐसे परिवारों के लिए शिक्षा ऋण मजबूरी बन जाता है। एक पिता पूरी जिंदगी की कमाई बेटे या बेटी की पढ़ाई में लगा देता है, इस उम्मीद के साथ कि शिक्षा भविष्य को सुरक्षित करेगी। लेकिन जब उसी शिक्षा पर भारी ब्याज लग जाता है, तो वह सपना धीरे-धीरे आर्थिक बोझ में बदलने लगता है।
    आज भारत में शिक्षा का निजीकरण तेजी से बढ़ा है। सरकारी संस्थानों की सीमित सीटों के कारण लाखों छात्रों को निजी कॉलेजों का रुख करना पड़ता है। वहाँ फीस इतनी अधिक होती है कि सामान्य परिवारों के लिए बिना ऋण के पढ़ाई संभव नहीं रह जाती। कई बार छात्र केवल फीस और ब्याज के कारण अपने सपनों के संस्थान छोड़ देते हैं। प्रतिभा आर्थिक क्षमता के सामने हार जाती है। यह स्थिति किसी भी लोकतांत्रिक और प्रगतिशील समाज के लिए चिंताजनक है।

     

     

    शिक्षा ऋण और वित्तीय दबाव पर आधारित समाचार चित्र, जिसमें एक चिंतित छात्र लैपटॉप के सामने बैठा है। साथ में इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और लॉ की पुस्तकों का ढेर, ब्याज दर का प्रतिशत चिन्ह और “Education Loan” चेकलिस्ट दिखाई गई है, जो महंगी पढ़ाई और मध्यमवर्गीय परिवारों की बढ़ती आर्थिक चिंता को दर्शाती है।
    शिक्षा ऋण और वित्तीय दबाव पर आधारित समाचार चित्र, जिसमें एक चिंतित छात्र लैपटॉप के सामने बैठा है। साथ में इंजीनियरिंग, मेडिकल, मैनेजमेंट और लॉ की पुस्तकों का ढेर, ब्याज दर का प्रतिशत चिन्ह और “Education Loan” चेकलिस्ट दिखाई गई है, जो महंगी पढ़ाई और मध्यमवर्गीय परिवारों की बढ़ती आर्थिक चिंता को दर्शाती है।
    यह भी विचारणीय है कि आज के समय में शिक्षा केवल व्यक्तिगत प्रगति का माध्यम नहीं रही, बल्कि आर्थिक और सामाजिक अस्तित्व की आवश्यकता बन चुकी है। बिना उच्च शिक्षा के बेहतर रोजगार प्राप्त करना कठिन होता जा रहा है। ऐसे में यदि शिक्षा ही महँगी और ऋण बोझिल होगा, तो सामाजिक असमानता और बढ़ेगी। जो परिवार आर्थिक रूप से मजबूत हैं, वे आगे निकल जाएंगे, जबकि सीमित साधनों वाले प्रतिभाशाली छात्र पीछे छूटते चले जाएंगे। यह केवल व्यक्ति की हानि नहीं होगी, बल्कि देश अपनी संभावित प्रतिभाओं को खो देगा।
    भारत सरकार को इस दिशा में गंभीर और दीर्घकालिक कदम उठाने की आवश्यकता है। सबसे पहले शिक्षा ऋण की ब्याज दरों को नियंत्रित किया जाना चाहिए। यदि सरकार वाहन उद्योग, रियल एस्टेट और अन्य क्षेत्रों को बढ़ावा देने के लिए विशेष आर्थिक नीतियाँ बना सकती है, तो शिक्षा जैसे मूलभूत क्षेत्र के लिए अलग वित्तीय नीति क्यों नहीं बनाई जा सकती? शिक्षा ऋण पर ब्याज न्यूनतम होना चाहिए और पढ़ाई पूरी होने तक ब्याज स्थगन की व्यवस्था व्यापक स्तर पर लागू की जानी चाहिए।
    इसके अतिरिक्त रोजगार मिलने तक ऋण पुनर्भुगतान में लचीलापन होना चाहिए। वर्तमान व्यवस्था में कई छात्रों पर डिग्री पूरी होते ही ईएमआई का दबाव शुरू हो जाता है, जबकि नौकरी मिलने में समय लग सकता है। यह मानसिक तनाव युवाओं की ऊर्जा और आत्मविश्वास दोनों को प्रभावित करता है। यदि सरकार और बैंक छात्रों को कुछ वर्षों का व्यावहारिक समय दें, तो वे अपने करियर को अधिक स्थिरता के साथ शुरू कर पाएंगे।
    शिक्षा ऋण के साथ करियर आधारित सहायता मॉडल भी विकसित किए जाने चाहिए। उदाहरण के लिए यदि कोई छात्र शोध, अध्यापन, सामाजिक सेवा या ग्रामीण क्षेत्रों में कार्य करना चाहता है, तो उसके ऋण में विशेष छूट दी जा सकती है। इससे समाज के आवश्यक लेकिन कम वेतन वाले क्षेत्रों में भी प्रतिभाशाली युवाओं का आकर्षण बना रहेगा।
    दुनिया के कई विकसित देशों में शिक्षा को सामाजिक निवेश माना जाता है। वहाँ सरकारें छात्रों को कम ब्याज पर ऋण, छात्रवृत्ति और आय आधारित पुनर्भुगतान जैसी सुविधाएँ देती हैं। भारत में भी यदि हम “विश्वगुरु” बनने की कल्पना करते हैं, तो हमें युवाओं को कर्ज के भय से मुक्त करना होगा। केवल भाषणों और नारों से ज्ञान आधारित समाज नहीं बनता, उसके लिए व्यवहारिक आर्थिक समर्थन भी आवश्यक होता है।
    यह सच है कि बैंकिंग व्यवस्था को भी अपने आर्थिक हित देखने होते हैं, लेकिन शिक्षा को केवल लाभ-हानि के चश्मे से नहीं देखा जा सकता। कार सड़क पर चलती है, लेकिन शिक्षा समाज को आगे बढ़ाती है। वाहन सुविधा देता है, लेकिन ज्ञान राष्ट्र का भविष्य गढ़ता है। यदि कार लोन सस्ता और शिक्षा ऋण महँगा है, तो यह हमारी प्राथमिकताओं के असंतुलन का संकेत है।
    आज आवश्यकता इस बात की है कि शिक्षा को उपभोग नहीं, निवेश माना जाए। एक शिक्षित युवा केवल अपनी जिंदगी नहीं बदलता, वह परिवार, समाज और राष्ट्र की दिशा भी बदल सकता है। इसलिए शिक्षा पर लगाया गया हर रुपया भविष्य की नींव होता है। सरकार, बैंकिंग संस्थानों और समाज—तीनों को मिलकर यह समझना होगा कि यदि प्रतिभा आर्थिक बोझ के नीचे दब गई, तो देश का विकास भी अधूरा रह जाएगा।
    जिस दिन भारत में शिक्षा ऋण को बोझ नहीं, अवसर की तरह देखा जाने लगेगा, उस दिन शायद किसी विद्यार्थी को अपने सपनों की कीमत भारी ब्याज में नहीं चुकानी पड़ेगी। तभी शिक्षा वास्तव में अधिकार बनेगी, सुविधा नहीं।
      (डॉ. प्रियंका सौरभ, पीएचडी (राजनीति विज्ञान), कवयित्री एवं सामाजिक चिंतक हैं।)
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