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    Home » भारत FDI भरोसे की टॉप 15 सूची से बाहर क्या भारतीय अर्थव्यवस्था नए बदलाव के दौर में है?

    भारत FDI भरोसे की टॉप 15 सूची से बाहर क्या भारतीय अर्थव्यवस्था नए बदलाव के दौर में है?

    Janta AwaazBy Janta AwaazMay 28, 202617 Views
    भारत की अर्थव्यवस्था, FDI निवेश संकट, बेरोजगारी, बंद होते उद्योग, गिरता ग्राफ, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप ग्रोथ और मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को दर्शाता हुआ हिंदी न्यूज़ इन्फोग्राफिक-फोटो AI
    भारत की अर्थव्यवस्था, FDI निवेश संकट, बेरोजगारी, बंद होते उद्योग, गिरता ग्राफ, डिजिटल इंडिया, स्टार्टअप ग्रोथ और मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग को दर्शाता हुआ हिंदी न्यूज़ इन्फोग्राफिक-फोटो AIChatGPT

    भारत एफडीआई भरोसे की टॉप 15 सूची से बाहर: क्या भारतीय अर्थव्यवस्था बदलाव के दौर में है या निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ रहा है?

    2014 से 2026 तक भारत की अर्थव्यवस्था: विकास, बेरोजगारी, कर्ज और निवेश संकट की पूरी कहानी

    क्या भारत में निवेशकों का भरोसा कमजोर पड़ रहा है? आम आदमी की जिंदगी से समझिए अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर

    2014 के विकास मॉडल से 2047 के विज़न तक — भारत की अर्थव्यवस्था की असली तस्वीर क्या कहती है?

     

    लेखक -राजीव गोयल -भारतीय अर्थव्यवस्था, नीति और सामाजिक मुद्दों पर विश्लेषणात्मक लेखन करते हैं।”

     

    भारत आज दुनिया की सबसे बड़ी आबादी वाला देश है। दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में उसका नाम तेजी से उभरा है। सरकार “विकसित भारत 2047”, “5 ट्रिलियन डॉलर इकोनॉमी”, “मेक इन इंडिया”, “डिजिटल इंडिया” और “आत्मनिर्भर भारत” जैसे अभियानों के जरिए भारत को वैश्विक आर्थिक शक्ति के रूप में पेश कर रही है।

    लेकिन दूसरी ओर महंगाई, बेरोजगारी, बढ़ते सरकारी कर्ज, छोटे उद्योगों की मुश्किलें और विदेशी निवेशकों के घटते भरोसे को लेकर गंभीर सवाल भी उठ रहे हैं।

    हाल ही में एफडीआई कॉन्फिडेंस इंडेक्स से जुड़ी चर्चाओं ने इस बहस को और तेज कर दिया। राजनीतिक बयानबाजी के बीच यह सवाल सामने आया कि क्या भारत में निवेशकों का भरोसा पहले जैसा मजबूत नहीं रहा? क्या आर्थिक विकास का लाभ जमीन तक पहुंच रहा है? और क्या भारत वास्तव में दुनिया की सबसे मजबूत उभरती अर्थव्यवस्थाओं में बना हुआ है?

    यह लेख भारत की अर्थव्यवस्था के स्वतंत्रता से लेकर 2026 तक के सफर, उपलब्धियों, चुनौतियों और निवेश माहौल की वास्तविक स्थिति को समझने का प्रयास है।

    आजादी के बाद भारत की अर्थव्यवस्था: संघर्ष से निर्माण तक

    1947 में जब भारत आजाद हुआ, तब देश आर्थिक रूप से बेहद कमजोर था। अंग्रेजों की औपनिवेशिक नीतियों ने भारत की उद्योग व्यवस्था और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को गहरा नुकसान पहुंचाया था।

    शुरुआती दशकों की चुनौतियां

    • कम औद्योगिक आधार
    • अत्यधिक गरीबी
    • सीमित विदेशी मुद्रा भंडार
    • कृषि पर निर्भर अर्थव्यवस्था
    • भारी बेरोजगारी

    देश के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने सार्वजनिक क्षेत्र आधारित विकास मॉडल अपनाया। बड़े बांध, स्टील प्लांट, सरकारी उद्योग और वैज्ञानिक संस्थान स्थापित किए गए। उसी दौर में आईआईटी, भेल, सेल और भाखड़ा नांगल जैसी परियोजनाएं शुरू हुईं।

    हालांकि बाद में “लाइसेंस राज” और अत्यधिक सरकारी नियंत्रण की आलोचना भी हुई क्योंकि इससे निजी निवेश और प्रतिस्पर्धा सीमित हो गई।

    1991: भारत का सबसे बड़ा आर्थिक मोड़

    1991 में भारत गंभीर आर्थिक संकट में पहुंच गया। विदेशी मुद्रा भंडार इतना कम रह गया कि देश मुश्किल से कुछ सप्ताह का आयात कर सकता था।

    तत्कालीन प्रधानमंत्री पीवी नरसिम्हा राव और वित्त मंत्री डॉ. मनमोहन सिंह ने आर्थिक उदारीकरण की शुरुआत की।

    आर्थिक सुधारों के मुख्य प्रभाव

    • विदेशी निवेश के लिए दरवाजे खुले
    • निजी कंपनियों को बढ़ावा मिला
    • आयात-निर्यात नियम आसान हुए
    • वैश्विक कंपनियों का भारत में प्रवेश बढ़ा
    • आईटी और सेवा क्षेत्र का विस्तार हुआ

    यही वह दौर था जिसने भारत को वैश्विक अर्थव्यवस्था से जोड़ा।

    2004 से 2014: तेज विकास और नई चुनौतियां

    यूपीए सरकार के दौरान भारत ने कई वर्षों तक तेज जीडीपी वृद्धि दर्ज की। आईटी सेक्टर, बैंकिंग, रियल एस्टेट और उपभोक्ता बाजार तेजी से बढ़े।

    सकारात्मक बदलाव

    • ग्रामीण रोजगार योजना मनरेगा लागू हुई
    • मोबाइल और इंटरनेट क्रांति बढ़ी
    • विदेशी निवेश में सुधार हुआ
    • मध्यम वर्ग का विस्तार हुआ
    • इंफ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में निवेश बढ़ा

    लेकिन चुनौतियां भी रहीं

    • भ्रष्टाचार के आरोप
    • बैंकिंग एनपीए संकट
    • नीति निर्णयों में देरी
    • महंगाई

    इसी दौर ने भारत को दुनिया की बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं में शामिल किया, लेकिन आर्थिक असमानता का सवाल भी बढ़ा।

    2014 के बाद: नए भारत का आर्थिक विज़न

    2014 में नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा सरकार सत्ता में आई। सरकार ने विकास, भ्रष्टाचार विरोध, निवेश आकर्षण और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को प्रमुख एजेंडा बनाया।

    सरकार की प्रमुख आर्थिक पहल

    मेक इन इंडिया

    भारत को वैश्विक मैन्युफैक्चरिंग हब बनाने का लक्ष्य रखा गया।

    डिजिटल इंडिया

    सरकारी सेवाओं और भुगतान प्रणाली को डिजिटल बनाने पर जोर दिया गया।

    जीएसटी

    पूरे देश में एक समान टैक्स व्यवस्था लागू की गई।

    इंफ्रास्ट्रक्चर विस्तार

    एक्सप्रेसवे, एयरपोर्ट, रेलवे और बंदरगाह परियोजनाओं में बड़े निवेश किए गए।

    पीएलआई स्कीम

    मोबाइल और इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग को बढ़ावा देने के लिए प्रोडक्शन लिंक्ड इंसेंटिव योजना शुरू की गई।

    भारत की जीडीपी वृद्धि: क्या आंकड़े मजबूत कहानी बताते हैं?

    भारत दुनिया की सबसे तेज़ी से बढ़ती बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में शामिल रहा है। कोविड महामारी के बाद भी भारत ने अपेक्षाकृत तेज रिकवरी दिखाई।

    प्रमुख आर्थिक संकेतक

    • भारत दुनिया की शीर्ष अर्थव्यवस्थाओं में शामिल है
    • सेवा क्षेत्र भारतीय अर्थव्यवस्था की बड़ी ताकत बना हुआ है
    • डिजिटल भुगतान में भारत विश्व के अग्रणी देशों में शामिल हुआ
    • स्टार्टअप इकोसिस्टम तेजी से बढ़ा

    लेकिन सवाल यह भी है कि क्या यह वृद्धि रोजगार और आय में भी दिखाई दे रही है?

    बेरोजगारी: विकास के बीच सबसे बड़ा सवाल

    भारत दुनिया का सबसे युवा देश माना जाता है, लेकिन रोजगार का संकट लगातार चर्चा में रहा है।

    कई रिपोर्टों के अनुसार शिक्षित युवाओं में बेरोजगारी दर चिंता का विषय बनी हुई है।

    इसके पीछे कारण

    • ऑटोमेशन और एआई
    • धीमी मैन्युफैक्चरिंग वृद्धि
    • छोटे उद्योगों पर दबाव
    • सरकारी नौकरियों में सीमित भर्ती
    • कौशल और रोजगार के बीच अंतर

    आलोचकों का कहना है कि भारत “जॉबलेस ग्रोथ” की स्थिति का सामना कर रहा है, जहां जीडीपी बढ़ती है लेकिन रोजगार उसी गति से नहीं बढ़ते।

    नोटबंदी और जीएसटी: सुधार या झटका?

    2016 की नोटबंदी भारत के आर्थिक इतिहास के सबसे बड़े फैसलों में से एक रही।

    सरकार ने इसके पीछे काला धन, नकली नोट और डिजिटल अर्थव्यवस्था को बढ़ावा देने का तर्क दिया।

    सरकार के अनुसार फायदे

    • डिजिटल भुगतान में तेज वृद्धि
    • टैक्स बेस बढ़ा
    • औपचारिक अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिला

    आलोचकों के अनुसार नुकसान

    • छोटे कारोबार प्रभावित हुए
    • असंगठित क्षेत्र कमजोर पड़ा
    • लाखों मजदूरों को रोजगार संकट झेलना पड़ा

    इसी तरह जीएसटी को ऐतिहासिक टैक्स सुधार कहा गया, लेकिन शुरुआती तकनीकी दिक्कतों ने छोटे कारोबारियों को परेशान किया।

    डिजिटल इंडिया और यूपीआई: भारत की बड़ी सफलता

    भारत की डिजिटल क्रांति को दुनिया ने भी सराहा है।

    प्रमुख उपलब्धियां

    • यूपीआई ट्रांजैक्शन में रिकॉर्ड वृद्धि
    • डिजिटल बैंकिंग का विस्तार
    • गांवों तक इंटरनेट पहुंच
    • सरकारी योजनाओं का डिजिटल वितरण

    भारत आज दुनिया के सबसे बड़े डिजिटल भुगतान बाजारों में गिना जाता है।

    यह सरकार की उन उपलब्धियों में शामिल है जिन्हें वैश्विक स्तर पर भी स्वीकार किया गया है।

    मोबाइल मैन्युफैक्चरिंग में भारत की छलांग

    एक समय भारत अधिकांश मोबाइल फोन आयात करता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में भारत मोबाइल असेंबली और उत्पादन का बड़ा केंद्र बनकर उभरा है।

    क्या बदला?

    • वैश्विक कंपनियों ने भारत में उत्पादन बढ़ाया
    • पीएलआई योजना से निवेश आकर्षित हुआ
    • इलेक्ट्रॉनिक्स निर्यात में वृद्धि हुई

    हालांकि विशेषज्ञ मानते हैं कि भारत को अभी भी हाई-एंड टेक्नोलॉजी और सेमीकंडक्टर क्षेत्र में लंबा सफर तय करना है।

    एफडीआई और निवेशकों का भरोसा

    एफडीआई यानी विदेशी प्रत्यक्ष निवेश किसी भी अर्थव्यवस्था में वैश्विक भरोसे का संकेत माना जाता है।

    भारत लंबे समय तक निवेशकों के लिए आकर्षक बाजार माना गया क्योंकि यहां:

    • विशाल उपभोक्ता बाजार है
    • युवा आबादी है
    • तेजी से बढ़ती डिजिटल अर्थव्यवस्था है

    लेकिन हाल के वर्षों में कुछ निवेशकों ने नीतिगत अनिश्चितता, टैक्स विवाद और वैश्विक मंदी जैसी चिंताएं भी जताई हैं।

    निवेशकों की मुख्य चिंताएं

    • अचानक नीति बदलाव
    • वैश्विक आर्थिक अस्थिरता
    • चीन+1 रणनीति में प्रतिस्पर्धा
    • वियतनाम और इंडोनेशिया जैसे देशों का उभार

    हालांकि दूसरी ओर भारत अब भी दुनिया की बड़ी कंपनियों के लिए महत्वपूर्ण बाजार बना हुआ है।

    रुपया बनाम डॉलर: क्या गिरती मुद्रा चिंता का संकेत है?

    भारतीय रुपया समय के साथ डॉलर के मुकाबले कमजोर हुआ है। इसके पीछे कई कारण होते हैं:

    • कच्चे तेल का आयात
    • वैश्विक डॉलर मजबूती
    • व्यापार घाटा
    • विदेशी निवेश निकासी

    लेकिन विशेषज्ञ कहते हैं कि केवल मुद्रा विनिमय दर से किसी अर्थव्यवस्था की पूरी ताकत तय नहीं होती। कई विकसित देशों की मुद्राएं भी समय-समय पर कमजोर होती रही हैं।

    एमएसएमई सेक्टर: भारत की असली रीढ़

    भारत की अर्थव्यवस्था में सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्योगों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण है।

    यह सेक्टर क्यों अहम है?

    • करोड़ों लोगों को रोजगार देता है
    • ग्रामीण और छोटे शहरों की अर्थव्यवस्था को सहारा देता है
    • निर्यात में योगदान देता है

    लेकिन कोविड, नोटबंदी और बाजार प्रतिस्पर्धा के बाद कई छोटे उद्योगों ने वित्तीय दबाव महसूस किया।

    विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि एमएसएमई सेक्टर मजबूत नहीं होगा तो रोजगार संकट और बढ़ सकता है।

    क्या भारत वेनेजुएला बन सकता है?

    राजनीतिक बहस में अक्सर भारत की तुलना वेनेजुएला से की जाती है, लेकिन आर्थिक विशेषज्ञ इस तुलना को पूरी तरह सही नहीं मानते।

    भारत की अर्थव्यवस्था कई मायनों में अलग है:

    • विविध आर्थिक ढांचा
    • मजबूत सेवा क्षेत्र
    • आईटी उद्योग
    • बड़ा घरेलू बाजार
    • लोकतांत्रिक संस्थाएं

    हालांकि चेतावनी यह जरूर दी जाती है कि यदि बेरोजगारी, असमानता और कर्ज लगातार बढ़ते रहे तो आर्थिक दबाव बढ़ सकते हैं।

    भारत का स्टार्टअप इकोसिस्टम: नई उम्मीद

    भारत दुनिया के सबसे बड़े स्टार्टअप इकोसिस्टम में शामिल हो चुका है।

    प्रमुख क्षेत्र

    • फिनटेक
    • एडटेक
    • हेल्थटेक
    • ई-कॉमर्स
    • एआई आधारित सेवाएं

    युवा उद्यमियों की नई पीढ़ी भारत की अर्थव्यवस्था को नई दिशा दे रही है।

    हालांकि फंडिंग संकट और वैश्विक मंदी का असर स्टार्टअप सेक्टर पर भी पड़ा है।

    क्या 2047 का सपना संभव है?

    सरकार का लक्ष्य है कि 2047 तक भारत विकसित राष्ट्र बने।

    यह लक्ष्य असंभव नहीं है, लेकिन इसके लिए केवल जीडीपी वृद्धि पर्याप्त नहीं होगी।

    किन क्षेत्रों पर सबसे ज्यादा ध्यान देना होगा?

    रोजगार

    युवाओं के लिए बड़े पैमाने पर नौकरियां।

    शिक्षा

    वैश्विक स्तर की स्किल आधारित शिक्षा व्यवस्था।

    स्वास्थ्य

    सस्ती और मजबूत स्वास्थ्य सेवाएं।

    न्याय और संस्थाएं

    निवेशकों को पारदर्शिता और स्थिरता का भरोसा।

    सामाजिक स्थिरता

    आर्थिक विकास के लिए सामाजिक विश्वास जरूरी है।

    भारत की अर्थव्यवस्था: संकट या परिवर्तन?

    भारत की अर्थव्यवस्था आज विरोधाभासों के दौर में है।

    एक तरफ:

    • हाईवे
    • डिजिटल पेमेंट
    • स्टार्टअप
    • मोबाइल निर्माण
    • इंफ्रास्ट्रक्चर

    दूसरी तरफ:

    • बेरोजगारी
    • महंगाई
    • ग्रामीण संकट
    • छोटे उद्योगों की चुनौतियां
    • बढ़ता कर्ज

    यानी भारत पूरी तरह संकट में भी नहीं है और पूरी तरह सुरक्षित भी नहीं।

    निष्कर्ष: भारत के सामने सबसे बड़ा सवाल भरोसे का है

    भारत आज दुनिया की सबसे महत्वपूर्ण अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। उसके पास युवा आबादी, बड़ा बाजार, तकनीकी क्षमता और विकास की अपार संभावनाएं हैं।

    लेकिन किसी भी देश की असली ताकत सिर्फ जीडीपी नहीं बल्कि जनता का आर्थिक भरोसा, रोजगार, निवेश माहौल और संस्थागत स्थिरता होती है।

    एफडीआई रैंकिंग, निवेशकों की राय और आर्थिक बहसें इस बात का संकेत हैं कि भारत को आने वाले वर्षों में सिर्फ प्रचार नहीं बल्कि वास्तविक आर्थिक सुधारों पर ज्यादा ध्यान देना होगा।

    यदि सरकारें विकास के लाभ को गांव, किसान, मजदूर, मध्यम वर्ग और छोटे कारोबार तक पहुंचाने में सफल होती हैं, तो भारत 2047 का सपना पूरा कर सकता है।

    लेकिन यदि आर्थिक विकास केवल आंकड़ों और बड़े दावों तक सीमित रह गया, तो निवेशकों और आम जनता — दोनों का भरोसा कमजोर पड़ सकता है।

    डिस्क्लेमर

    यह लेख विभिन्न सार्वजनिक बयानों, आर्थिक रिपोर्टों, सरकारी आंकड़ों और विशेषज्ञों की राय पर आधारित एक विश्लेषणात्मक लेख है। इसका उद्देश्य किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति के पक्ष या विरोध में प्रचार करना नहीं बल्कि भारतीय अर्थव्यवस्था से जुड़ी बहस और तथ्यों को संतुलित रूप में प्रस्तुत करना है।

     

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